ध्यान नहीं बदला, तो टीवी ही देख लो
जो ध्यान
जीवन को न बदले,
वह ध्यान नहीं—
मन को सुलाने की
एक आदत भर है।
आँखें बंद करना
ध्यान नहीं है।
यदि आँखें खुलने पर
ज़िंदगी वैसी ही रहे,
तो भीतर
कुछ भी नहीं जागा।
सच्चा ध्यान
जीवन के केंद्र तक
पहुँचता है—
और वहाँ
हस्तक्षेप करता है।
वह
तोड़ता है
पुरानी सुविधाओं को,
उधेड़ता है
झूठी पहचान को,
और
नए ढंग से
जीने की माँग करता है।
यदि तुम
ध्यान में बैठे रहे,
पर
रिश्ते वैसे ही रहे,
काम वही रहा,
भोग वही रहा,
लालच और डर
ज्यों के त्यों रहे—
तो
ध्यान नहीं हुआ,
सिर्फ़
स्वयं को
धोखा दिया गया।
ध्यान का अर्थ
कोई भीतरी चमक नहीं,
कोई हल्की शांति नहीं।
ध्यान का अर्थ है—
जीवन में
ठोस परिवर्तन।
खाने में,
कमाने में,
खर्च में,
बोलने में,
चुनने में।
यदि
तुम्हारी प्राथमिकताएँ
ज्यों की त्यों हैं,
तो
चटाई पर बिताया समय
सिर्फ़
एक रस्म था।
वह
जागरण नहीं—
सुन्नता थी।
सच्चा ध्यान
आग है।
यदि
उस आग में
कुछ जला नहीं,
कुछ टूटा नहीं,
कुछ बदला नहीं—
तो
तुम ध्यान नहीं कर रहे थे,
तुम
सिर्फ़
अच्छा महसूस करना
चाह रहे थे।
और ईमानदारी से कहूँ—
तो
ईमानदारी से
टीवी देख लेना
बेहतर है
बेईमानी से
ध्यान करने से।
क्योंकि
सोया होना
कम खतरनाक है
जागने का
नाटक करने से।





