दुनिया उसी को हिलाती है, जो हिलने योग्य होता है

दुनिया उसी को हिलाती है, जो हिलने योग्य होता है

यदि तुम स्वयं को
हिलने योग्य मानते हो,
तो
सब कुछ
तुम्हें हिला देगा।

एक छोटी-सी टिप्पणी,
एक मामूली बदलाव,
एक तुच्छ घटना—
हर चीज़
तुम्हारे केंद्र तक
पहुंच जाएगी।

पर यदि तुम
स्वयं को
अडिग मान लो,
तो देखो—
दुनिया वही रहती है,
लोग वही रहते हैं,
पर
उनकी शक्ति
खत्म हो जाती है।

यदि तुम
खुद को छोटा समझते हो,
तो
सब कुछ
विशाल लगने लगता है—
हर चेहरा डराने वाला,
हर चुनौती
असहनीय।

और यदि तुम
अपने को
विस्तृत मानते हो,
तो
दुनिया
तुम्हें कैसे डराएगी?

उसके
ताने,
उसके
डर,
उसकी
धमकियाँ—
कहीं टिकती नहीं।

पर यह मानना
कोई
मानसिक तरकीब नहीं है।
कोई
मुश्किल घड़ी का
नकाब नहीं।

अपने को विशाल मानना
का अर्थ है—
विशाल होकर जीना।

और विशाल होकर जीना
मतलब—
तुच्छता को
पूरी तरह छोड़ देना।

कभी-कभी नहीं,
चुन-चुनकर नहीं—
बल्कि
स्वभाव से।

तुम्हारे जीवन में
कुछ होना चाहिए
जो
समझौते से परे हो।

कुछ ऐसा
जो
मत से अछूता हो,
डर से अछूता हो,
लालच से अछूता हो।

एक ऐसा केंद्र
जो
पवित्र हो,
अभेद्य हो।

यदि ऐसा केंद्र नहीं है,
तो
तुम हवाओं के
हवाले हो।

और हवाओं में
कोई दया नहीं होती।

वे
जिधर चाहें
बहती हैं।

और तुम—
बिना लंगर के—
उनके साथ
बहते चले जाते हो।

सत्य से प्रेम करने वाला
सत्य में
स्थिर रहता है।

बाक़ी सब
आस्था और संशय के
बीच
डोलते रहते हैं।

दुनिया
सभी के लिए
एक-सी है।

हिलता
सिर्फ़ वही है
जो
भीतर से
हिल रहा होता है।

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