सफल हो रहे हो — या कब्ज़े में जा रहे हो?
तुम सोचते हो
कि जीत रहे हो—
पर असल में
तुम्हें जीता जा रहा है।
जिसे तुम
दुनियावी सफलता कहते हो,
वह अक्सर दुनिया की
तुम पर निर्दय जीत होती है।
यह तुम्हारा
विश्व पर विजय नहीं—
यह विश्व का
तुम्हें अपने कब्ज़े में ले लेना है।
दुनिया
तुम्हें सिर्फ़ लुभाती नहीं।
वह तुम्हें पालतू बनाती है।
फिर उस पालतूपन को
तुम्हारा उपलब्धि-पत्र
घोषित कर देती है।
दुनिया तुम्हारे
चुनावों में बोलती है।
तुम्हारी इच्छाओं से
साँस लेती है।
तुम्हारी महत्त्वाकांक्षाओं के पीछे
छुपकर चलती है।
और तुम कहते हो—
यह मेरी सफलता है?
नहीं।
यह दुनिया की जीत है।
तो फिर
सच्ची दुनियावी सफलता क्या है?
यह कि
दुनिया तुम्हारे मन पर
हावी न हो पाए।
यह कि दुनिया की आवाज़
तुम्हारी भीतरी आवाज़ को
डुबो न सके।
यह कि दुनिया के घाव
तुम्हारे केंद्र तक न पहुँचें।
यह कि
तुम प्रसिद्धि,
धन,स्वीकृति
या सुविधा के बदले
अपनी स्वतंत्रता न सौंप दो।
सच्ची सफलता
दुनिया के कहे पर
चलना नहीं है।
सच्ची सफलता है—
वह करना
जो दुनिया को
खुद से मुक्त करे।
दुनियावी सफलता
खेल को
बेहतर खेलना नहीं है।
वह है—
खेल बनने से
इनकार कर देना।
असली विजेता
वह नहीं
जो नियमों में
महारत हासिल कर ले।
असली विजेता
वह है
जो खेल से
ऊपर उठ जाए।
इसलिए
अपने आप से
यह मत पूछो—
मैं दुनिया में
कैसे सफल होऊँ?
पूछो—
मैं दुनिया के कब्ज़े से
कैसे मुक्त होऊँ?
क्योंकि
जब तक
तुम उसकी पकड़ में हो,
तब तक
उसका हर इनाम
सिर्फ़ एक और
मज़बूत ज़ंजीर है।





