चन्द्र स्तुति- अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”
प्रकृति और पर्यावरणइस रचना में चंद्रदेव भगवान् की स्तुति की गयी है |
सोम स्तुति ( चन्द्र स्तुति ) – वंदना – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”
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इस रचना में चंद्रदेव भगवान् की स्तुति की गयी है |
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परशुराम की प्रतीक्षा -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ छोड़ो मत अपनी आन, शीश कट जाए,मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जाए। दो बार नहीं यमराज कण्ठ हरता है,मरता है जो, एक ही बार मरता है। तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे।जीना है तो मरने से नहीं डरो रे॥ आँधियाँ नहीं जिसमें उमंग भरती
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मेरी अभिलाषा है -द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी सूरज-सा दमकूँ मैंचंदा-सा चमकूँ मैंझलमल-झलमल उज्ज्वलतारों-सा दमकूँ मैंमेरी अभिलाषा है। फूलों-सा महकूँ मैंविहगों-सा चहकूँ मैंगुंजित कर वन-उपवनकोयल-सा कुहकूँ मैंमेरी अभिलाषा है। नभ से निर्मलता लूँशशि से शीतलता लूँधरती से सहनशक्तिपर्वत से दृढ़ता लूँमेरी अभिलाषा है। मेघों-सा मिट जाऊँसागर-सा लहराऊँसेवा के पथ पर मैंसुमनों-सा बिछ जाऊँमेरी अभिलाषा है। -द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
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यह विभिन्न श्रेणियों के अर्न्तगत हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओँ एवं ब्रेल लिपि में पुस्तकें प्रकाशित करता है। यह हर दूसरे वर्ष नई दिल्ली में ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आयोजन करता है, जो एशिया और अफ्रीका का सबसे बड़ा पुस्तक मेला है। यह प्रतिवर्ष 14 से 20 नवम्बर तक ‘राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह’ भी मनाता है। विश्व पुस्तक दिवस पर दोहे ज्ञान,ध्यान,विज्ञान
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विश्व कविता दिवस प्रतिवर्ष २१ मार्च को मनाया जाता है। यूनेस्को ने इस दिन को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा वर्ष 1999 में की थी जिसका उद्देश्य को कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए था। कविता की पौष्टिकता – 19.04.21 ——————————————————–खाना बनाना बड़ा कठिन काम होता
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हम भी दीवाने और तुम भी दीवाने इश्क में हो गये हम दीवानेइश्क में हो गये हम वीरानेइश्क में दौलत क्या है ?इसमें लुट गये सारे खजानेइश्क में हो गये हम दीवानेहम भी दीवाने और तुम भी दीवाने।। शीरीं भी मर गयी मर गया फराद भीलैला भी मर गई मर गया मजनू भीमर जायें इश्क
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जिंदगी में बहुत काम आती है यह छत नीचे होता हूँ तो साया बनके सुलाती हैयह छत।ऊपर होता हूँ तो खुले आसमां की सैरकराती है यह छत।नीचे होता हूँ तो छाँव बन जाती है यह छतऊपर चढ़ जाऊँ तो जमीं का एहसासदिलाती है यह छत।कद्र करता हूँ इसकी यह सोचकरकि हर किसी को नहीं मिलती
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नवीन कल्पना करो तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो। तुम कल्पना करो। अब घिस गईं समाज की तमाम नीतियाँ,अब घिस गईं मनुष्य की अतीत रीतियाँ,हैं दे रहीं चुनौतियाँ तुम्हें कुरीतियाँ,निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए-तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो। तुम कल्पना करो जंजीर टूटती कभी न अश्रु-धार से,दुख-दर्द दूर भागते नहीं दुलार
नवीन कल्पना करो- गोपालसिंह नेपाली Read More »
“भाभभगा” जब वर्ण सजे।
‘सारवती’ तब छंद लजे।।
सारवती छंद -विरह वेदना (बासुदेव अग्रवाल) Read More »
अवतार नाथ अब धारो।
तुम भूमि-भार सब हारो।।
सिंहनाद छंद विनती (बासुदेव अग्रवाल) Read More »
हम विकास के पथ-अनुगामी।
सघन राष्ट्र के नित हित-कामी।।
सुमति छंद (भारत देश) बासुदेव अग्रवाल Read More »
श्री रामनवमी के अवसर पर यह रचना मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के प्रति जन जन की आस्था को समर्पित है।
रचना विधा – कविता
शीर्षक – जननायक राम
रचयिता – श्रीमती ज्योत्स्ना मीणा
जननायक राम / श्रीमती ज्योत्स्ना मीणा Read More »