कविता बहार

चल मेरे भाई – वन्दना शर्मा

हिंदी कविता

चल मेरे भाई – वन्दना शर्मा चलो आज गुजार लेते हैं कुछ खुशी के लमहे,बन जाते हैं एक बार फिरसिर्फ इंसान,और चलते हैं वहाँउसी मैदान में जहाँ,राम और रहीम एक साथ खेलते हैं।चढ़ाते हैं उस माटी का एक ही रंगचलते हैं उस मंदिर और मस्जिद के विवाद की भूमि परदोनों मिलकर बोएँगे प्रेम के बीजचल […]

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आईना पर कविता – कुमुद श्रीवास्तव वर्मा

हिंदी कविता

आईना पर कविता – कुमुद श्रीवास्तव वर्मा हमको, हमीं से मिलाता है आईना. इस दिल के जज्बात बताता है आईना. हुआ किसी पे फिदा ,ये बताता है आईना. संवरनें की चाह जगाता है आईना. उम्र के तजुर्बों को बताता है आईना. चेहरे की लकीरों को दिखाता है आईना बालों की सफेदी को बताता ये आईना

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हाइकु

शीत ऋतु पर हाइकु – धनेश्वरी देवांगन

हिंदी कविता

शीत ऋतु पर हाइकु – धनेश्वरी देवांगन          सिंदुरी भोर      धरा के मांग  सजी        लागे दुल्हन         नव रूपसी      दुब मखमली  सी        छवि न्यारी  सी          कोहरा छाया     एक पक्ष वक्त  का      दुखों  का साया         शीत अपार    स्वर्णिम रवि रश्मि        सुख स्वरूप        ओस के मोती       जीवन के 

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doha sangrah

रुक्मणि मंगल दोहे / पुष्पा शर्मा “कुसुम”

हिंदी कविता

रुक्मणि मंगल दोहे / पुष्पा शर्मा “कुसुम” विप्र पठायो द्वारिका,पाती देने काज।अरज सुनो श्री सांवरे,यदुकुल के सरताज।। रुक्मणि ने पाती लिखी,सुनिये  श्याम मुकुंद।मो मन मधुप लुभाइयो,चरण- कमल मकरंद।। सजी बारात विविध विधि,आय गयो शिशुपाल।सिंह भाग सियार कहीं,ले जावे यहि काल।।    जो न समय पर पहुँचते,यदुवर चतुर सुजान।देह धरम निबहै नहीं,तन न रहेंगे प्राण।। त्रिभुवन सुन्दर

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हार कर जीतना – पूनम दुबे

समाज और यथार्थ

हार कर जीतना – पूनम दुबे सही तो है हार कर भी,मैं जीत रही हूं,तुम्हारे लिए कभी बच्चों,के लिए कभी परिवार ,के लिए मैं हार कर भी जीत ,रही हूं,क्या हुआ अगर मेरे आत्मसम्मान परचोट लगती,है मेरे आंसुओं से क्या फर्क,पड़ता है ,बात तो ठहरजाती है ना, सबकी बातरह तो जाती है ना, मैं भी

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आखिर कब आओगे – रश्मि शर्मा

हिंदी कविता

आखिर कब आओगे – रश्मि शर्मा मुझे अकेला छोड़कर कहाँ जाओगे तुम,इन्हीं राहों में खड़ी हुँ कभी तो मिलोगे तुम। छोटी सी बात पर आंख फेर ली तुमने,कब तक यूँ मुझसे रूठे ही रहोगे तुम। रात भर जागती रही आंखे मेरी यहाँ,सपनों में न आकर मुझे सताओगे तुम। मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही

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मुसाफिर पर कविता

हिंदी कविता

 चल मुसाफिर चल-केवरा यदु “मीरा “ जिन्दगी  काँटों भरी है चल मुसाफिर चल ।गिर गिर कर उठ संभल मुसाफ़िर चल । लाख तूफाँ आये तुम रूकना नहीं।मंजिलों की चाह  है झुकना नहीं ।मंजिल तुझे मिल जायेगी आज नहीं तो कल। याद रख जो आँधियों से है टकराते ।मंजिल कदम चूमने उनके ही आते।गुनगुनाना कर मुस्कुरा

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साल पर कविता

हिंदी कविता

साल ही तो है कुछ को होगी ख़ुशी, कोई ग़म से भर जाएगान जाने ये नया साल भी, क्या कुछ कर जाएगा कुछ अरमान होंगे पूरी इसमें उम्मीद है हमेंऔर कुछ इस साल कि तरह ख़ुद में मर जाएगा टूटा है गर मोहब्बत तो, हो ही जाएगा दोबाराबस देखो एहतियातन वहाँ तज जहाँ तक नज़र

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धर्म एक धंधा है

समाज और यथार्थ

धर्म एक धंधा है  गंगाधर मनबोध गांगुली “सुलेख “        समाज सुधारक ” युवा कवि “ क्या धर्म है ,क्या अधर्म है ? आज अधर्म को ही धर्म समझ बैठें हैं । धर्म से ही वर्ण व्यवस्था ,                             समाज में आया है ।धर्म ही इंसान को ,               इंसान का दुश्मन बनाया है ।।01।। वर्ण व्यवस्था बाद

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atal bihari bajpei

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता मानवता के प्रेणता थे।            राष्ट के जन नेता थे।भारत माँ के थे तुम लाल।       प्रजातंत्र में किया कमाल।।विरोधी भी कायल थे।         दुश्मन भी घायल थे।।पत्रकार व कवि सुकुमार।        प्रखर वक्ता में थे सुमार।।जीवन की सच्चाई लिखने वाले।     सबके दिलो को जीतने वाले।।तुम्हारे मृत्यु पर दुनिया रोया है।आसमान मे घने कोहरे होया

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मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ

हिंदी कविता

मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ, मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ,जब आँखों से मोहब्बत देखता हूँ।अब जल्दी नहीं कि सामने आओ मेरे,मैं तो तस्वीर भी दूर कर देखता हूँ।जहां में सब उजाले में देखते हैं तुम्हें,मैं तो अंधेरे में तेरा चेहरा देखता हूँ।सब तुझमें, खुद को देखना चाहते थे,मैं चाहता

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इन गुलमोहरों को देखकर

हिंदी कविता

कविता/निमाई प्रधान’क्षितिज’ इन गुलमोहरों को देखकर दिल के तहखाने में बंद कुछ ख़्वाहिशें…आज क्यों अचानक बुदबुदा रही हैं?महानदी की… इन लहरों को देखकर!! कि ननिहाल याद आता है..इन गुलमोहरों को देखकर!! शाही अपना भी रूतबा थामामाजी के गाँव में!!बचपन में हम भी..हुआ करते थे राजकुमार..सुबहो-शाम घूमा करते थेनाना की पीठ पर होके सवार..हमारे हर तोतले

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