कविता बहार

श्रीराम पर कविता – बाबूराम सिंह

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कविता भक्त वत्सल भगवान श्रीराम —————————————– सूर्यवंशी सूर्यकेअवलोकि सुचरित्र -चित्र,तन – मन रोमांच हो अश्रु बही जात है।सुखद- सलोना शुभ सदगुण दाता प्रभु ,नाम लेत सदा भक्त बस में हो जातहैं। नाम सीताराम सुखधाम पतित -पावन ,पाप-ताप आपो आप पलमें जरि जात है ।पामर ,पतित अरू पातकी अघोर हेतु ,सेतु बनी तार बैकुण्ठ को ले […]

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सुफल बनालो जन्म कृष्णनाम गायके – बाबूराम सिंह

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सुफल बनालो जन्म कृष्णनाम गायके कृष्ण सुखधाम नाम परम पुनीत पावन ,पतित उध्दार में भी प्यार दिखलाय के।कर की मुरलिया से मोहे त्रिलोक जब ,सुफल बना लो जन्म कृष्ण नाम गाय के। चौदह भुवन ब्रह्मांण्ड त्रिलोक सारा ,पालन संहार सृष्टि छन में रचाय के ।कलिमल त्रास से उदास आज जन-जन ,वेंणु स्वर फूंक फिर भारत

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जीवन पर कविता – नीरामणी श्रीवास

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सिंहावलोकनी दोहा मुक्तकजीवन जीवन के इस खेल में,कभी मिले गर हार ।हार मान मत बैठिए , पुनः कर्म कर सार ।।सार जीवनी का यही , नहीं छोड़ना आस ।आस पूर्ण होगा तभी , सद्गुण हिय में धार ।। जीवन तो बहुमूल्य है , मनुज गँवाये व्यर्थ ।व्यर्थ मौज मस्ती किया , नहीं समझता अर्थ ।।अर्थ

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लेखनी तू आबाद रहे – बाबूराम सिंह

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कविता लेखनी तू आबाद रह ——————————- जन-मानस ज्योतित कर सर्वदा, हरि भक्ति प्रसाद रह। लेखनी तूआबाद रह। पर पीडा़ को टार सदा, शुभ सदगुण सम्हार सदा। ज्ञानालोक लिए उर अन्दर, कर अन्तः उजियार सदा। बद विकर्म ढो़ग जाल फरेब का, कभी नहीं फरियाद रह। लेखनी तू आबाद रह। शुभ सदगुण सत्कर्म सिखा, सत्य धर्म की

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क्यों करता हूँ कागज काले – डी कुमार–अजस्र

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क्यों करता हूँ कागज काले.. क्यों करता हूं कागज काले …??बैठा एक दिन सोच कर यूं ही ,शब्दों को बस पकड़े और उछाले ।आसमान यह कितना विस्तृत ..?क्या इस पर लिख पाऊंगा ?जर्रा हूं मैं इस माटी का,माटी में मिल जाऊंगा। फिर भी जाने कहां-कहां से ,कौन्ध उतर सी आती है ..??अक्षर का लेकर स्वरूप

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चलो,चले मिलके चले – रीतु प्रज्ञा

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विषय-चलों,चले मिलके चलेविधा-अतुकांत कविता *चलो,चले मिलके चले* ताली एक हाथ सेनहीं बजती कभीचलने के लिए भीहोती दोनों पैरों की जरूरतफिर तन्हा रौब से न चले,चलो,चले मिलके चले।शक्ति है साथ मेंनहीं विखंड कर सकता कोईकरता रहता जागृत सोए आत्मा कोहरता प्रतिपलउदासीपन, असहनीय दर्द कोछोड़ साथियों को यारान पथ पर बढ़ चलेचलो, चले मिलके चलेहोती है विजयक

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नशा नर्क का द्वार है – बाबूराम सिंह

नारी जीवन और संवेदना

हिंदी कविता – नशा नर्क का द्वार है मानव आहार के विरूध्द मांसाहार सुरा,बिडी़ ,सिगरेट, सुर्ती नशा सब बेकार है।नहीं प्राणवान है महान मानव योनि में वो,जिसको लोभ ,काम,कृपणता से प्यार है। अवगुण का खान इन्सान बने नाहक में,बिडी़, सुर्ती,सुरा नशा जिसका आहार है।सर्व प्रगति का गति अवरोध करे,ऐसा जहर बिडी़ , सुर्ति मांसाहार है।

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प्रात: वन्दन – हरीश बिष्ट

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जन-जन  की रक्षा है  करती |भक्तजनों  के दुख भी हरती ||ऊँचे   पर्वत   माँ   का   डेरा |माँ   करती   है  वहीं  बसेरा || भक्त   पुकारे   दौड़ी   आती |दुष्टजनों   को   धूल  चटाती ||भक्तों   की करती  रखवाली |जगजननी  माँ  खप्परवाली || भक्त सभी जयकार लगाते |चरणों में नित शीश नवाते ||मनोकामना    पूरी   करती |खुशियों से माँ झोली भरती ||

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जय जय हनुमान पर कविता हिंदी में – बाबूराम सिंह

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जय जय हनुमान पर कविता जय भक्त शिरोमणि शरणागत जय हो कृपानिधान।जयबजरंगी रामदूत जय पवनपुत्र जय जय हनुमान।। जय आनंद कंदन केशरी नंदन जग वंदन शुभकारी।जय मद खलगंजन असुरनिकंदन भवभंजन भयहारी।जय जयजनपालक द्रुतगतिचालक सुचिमय फलहारी।जय श्रीहरि धावन प्रभु गुणगावन पावन प्रेम पुजारी। जय अंजनी लाला शुभ योग निराला जय महिमान।जय बजरंगी रामदूत जय पवनपुत्र जय-जय

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साक्षरता अभियान – बाबूराम सिंह

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विश्व साक्षरता दिवस की हार्दिक मंगल शुभ कामनायें साक्षरता अभियान —————————–साक्षरता अभियान चलायें,घर-घर अलख जगायें। जन-जन साक्षर भव्य बनायें,ज्ञान ज्योति फैलायें। बिना विद्या नर बैल समाना ,कहता है जग सारा।मिटे नहीं विद्या बिन कभीभी,मानव मनअँधियारा।तम अंधकार तिमिर सभी मिल,आओ दूर भगायें।साक्षरता अभियान चलायें ,घर-घर अलख जगायें। विद्या धन ऐसा है जगत में,बाँट न सकता कोई।बिन

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गणपति बाबा

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गणपति को विघ्ननाशक, बुद्धिदाता माना जाता है। कोई भी कार्य ठीक ढंग से सम्पन्न करने के लिए उसके प्रारम्भ में गणपति का पूजन किया जाता है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन “गणेश चतुर्थी” के नाम से जाना जाता हैं। इसे “विनायक चतुर्थी” भी कहते हैं । महाराष्ट्र में यह उत्सव सर्वाधिक

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श्री राधा अष्टमी पर हिंदी कविता

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श्री राधा अष्टमी पर हिंदी कविता सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि श्री राधाष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है। श्री राधाजी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। राधा पुकारे  तोहे राधा पुकारे  तोहे  श्याम  हाथ जोड़  कर।आ जाओ  मोहन  प्यारे  मथुरा  को छोड़  कर।।आ

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