कविता बहार

सृजन-गीत – हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश

हिंदी कविता

सृजन-गीत कब गायेगा – हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश कोई बता दे मानवता का ,परचम कब लहरायेगा,तहस-नहस को आतुर मानव,सृजन-गीत कब गायेगा। टेक। क्षिति-जल-अम्बर नित विकास के,बन कर साक्ष्य महान हुए,धरा बधूटी बन मुसकाई,स्वप्निल सुखद बिहान हुए।द्वन्द्व-द्वेष ने कब आ घेरा,मुझको कौन बतायेगा।कोई बता दे मानवता का ,परचम कब लहरायेगा।1। श्मशान पटे हैं लाशों से,असहाय तड़पती सॉसों […]

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कुल्हाड़ी पर कविता – आशीष कुमार

हिंदी कविता

जीवन मूल्य चुकाती कुल्हाड़ी – आशीष कुमार कुल्हाड़ी तीखे नैन नक्श उसकेजैसे तीखी कटारीरुक रुक कर वार करतीतीव्र प्रचंड भारीअसह्य वेदना सह रहा विशाल वृक्षकाट रही है नन्हीं सी कुल्हाड़ी शक्ति मिलती उसको जिससेकर रही उसी से गद्दारीखट खटाक खट खटाकचीर रही नि:शब्द वृक्ष कोकाट रही अंग-अंग उसकाजिसके अंग से है उसकी यारी परंतु दोषी

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स्कूल चलें हम – अकिल खान

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

स्कूल चलें हम – अकिल खान है नन्हें पैर मेरे,हौसला अफजाई बढ़ाने को,जाता हूँ स्कूल पढ़ने,इस मन को पढ़ाने को।हूं अडिग,एक नया अध्याय लिखने को,जाता हूं स्कूल शिक्षा-ज्ञान सीखने को।शिक्षा से दूर करूं,मैं अशिक्षा का भ्रम,गढ़ने एक नया अध्याय,स्कूल चलें हम। शिक्षक का डांट,मुझे एक नई राह दिखाता है,पुस्तक,कॉपी,कलम,मुझे सीखना सिखाता है।कभी अज्ञानता से पग

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जीवन पर कविता – कुसुम

हिंदी कविता

मुसाफिर हैं हम जीवन पथ के मुसाफिर हैं हम जीवन पथ केराहें सबकी अलग-अलगधूप-छांव पथ के साथी हैंमंज़िल की है सबको ललक। राही हैं संघर्ष शील सबदामन में प्यार हो चाहे कसकपीड़ा के शोलों में है कोईकोई पा जाता खुशियों का फलक। मुसाफिर हूँ मैं उस डगर कीकाँटों पर जो नित रोज चलामधुऋतु हो या

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जिन्दगी पर कविता – पुष्पा शर्मा

प्रकृति और पर्यावरण

जिन्दगी का मकसद रोज सोचती हूँ।जिन्दगी का मकसदताकती ही रहती हूँमंजिल की लम्बी राह। सोचती ही रहती हूँप्रकृति की गतिविधियाँ,जो चलती रहती अविराम।सूरज का उदय अस्तरजनी दिवस का निर्माण। रात का अंधियारा करता दूरचाँद की चाँदनी का नूर।तारों की झिल मिल रहतीअँधेरी रातों का भय हरती। शीतल समीर संग होता सवेरा,परीन्दों के कलरव ने सृष्टि

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आज भी बिखरे पड़े हैं – गंगाधर मनबोध गांगुली

समाज और यथार्थ

आज भी बिखरे पड़े हैं – गंगाधर मनबोध गांगुली         गंगाधर मनबोध गांगुली ” सुलेख “           समाज सुधारक ” युवा कवि “ कल तक बिखरे पड़े थे ,           आज भी बिखरे पड़े हैं ।अपने आप को देखो ,             हम कहाँ पर खड़े हैं ।।01।। बट गये हैं लोग ,              जाति और धर्म पर ।गर्व करते रहो ,              मूर्खतापूर्ण

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लालसा पर कविता – पूनम दुबे

हिंदी कविता

लालसा पर कविता जो कभी खत्म ना हो,रोज एक के बाद एक,नई इच्छाओं का जन्म होना,पाने की धुन बनी रहती है, लालसा सबको खुश रखने तक,सपनों को पूरा करने तक,कब चैन की सांस लेंगे,अंधेरों से उजालों तक,कभी तो चैन मिलेगा ,पर ये लालसा बढ़ती रहती है, तुमसे कुछ कहूं कब सुनोगे मेरी बात,कुछ तुम्हें बताना

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महानदी पर कविता – केवरा यदु

हिंदी कविता

मोर महानदी के पानी मा – केवरा यदु चाँदी कस चमके चम चम जिंहा चंदा नाचे छम छम ।सोंढू पैरी के संगम भोले के ड़मरु  ड़म ड़म ।मोर महानदी के पानी  मा। महानदी के बीच में बइठे शिव भोला भगवान ।सरग ले देवता धामी आके करथें प्रभू गुणगान ।माता सीता बनाइस शिव भोले ला मनाइस

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संतोषी महंत की नवगीत – संतोषी महंत

हिंदी कविता

संतोषी महंत की नवगीत हंसकर जीवन​-अथ लिख दें या रोकर अंजाम लिखें।जीवन  की  पीड़ाओं  के औ कितने आयाम लिखें।। धाराओं ने सदा संभालातटबंधों ने रार किया।बचकर कांटों से निकले तोफूलों ने ही वार किया।।बंटवारा लिख दें किस्मत काया खुद का इल्जाम लिखें।।जीवन की पीड़ाओं के……. चौसर की छाती पर खुशियोंके जब-जब भी पांव परे।कृष्णा कहलाने

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हाइकु

एकांत/हाइकु/निमाई प्रधान’क्षितिज’

हिंदी कविता

एकांत/हाइकु/निमाई प्रधान’क्षितिज’ [१]मेरा एकांत सहचर-सर्जक उर्वर प्रांत! [२]दूर दिनांततरु-तल-पसरा मृदु एकांत! [३]वो एकांतघ्न वातायन-भ्रमर न रहे शांत ! [४]दिव्य-उजासशतदल कमल एकांतवास ! [५]एकांत सखाजागृत कुंडलिनी प्रसृत विभा ! *-@निमाई प्रधान’क्षितिज’*      रायगढ़,छत्तीसगढ़   मो.नं.7804048925

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छत्तीसगढ़ी गीत – तेरस कैवर्त्य

हिंदी कविता

छत्तीसगढ़ी गीत – झिन रोबे दाई मोर झिन रोबे दाई मोर झिन रोबे बाई मोर।रात दिन गुनत तंय ह झिन रोबे न ss अकेला ही जाहूँ , कोनो नइ जावय संग म। झुलत रही मुहरन , तोर नजरे नजर म।भुइंया म आके , झिन जीयव घमंड म।काँटा खूँटी झिन गड़व , जिन्गी डहर म।राख हो

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प्यार तुम ही से करता हूँ – कृष्ण सैनी

हिंदी कविता

प्यार तुम ही से करता हूँ – कृष्ण सैनी विरह को पीकर में,आज इक इंसाफ करता हु।प्यार तुम ही से करता था,प्यार तुम ही से करता हु। सोचा इत्तला कर दूं,अब भी तुझपे  ही मरता हु।प्यार तुम ही से करता था,प्यार तुम ही से करता हूँ। मेरी कोशिश थी बस इतनी,कभी बदनाम ना हो तु।की

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