कविता बहार

शादी की सालगिरह – सुधीर श्रीवास्तव

हिंदी कविता

शादी की सालगिरह  – सुधीर श्रीवास्तव आइए!मुझे मुबारकबाद दीजियेमगर मुझे छोड़ियेमेरी श्रीमती को ही यह उपहार दीजिये जिसनें मुझे झेला है,मेरी बात न कीजियेउसका जीवन जैसे नीम करेला है। शादी का लड्डू मुझे बहुत भायापर श्रीमती जी का शुगर लेवलअचानक बहुत बढ़ गया,अब वो बेलन संग सिर पर सवार हैं,अपना शुगर लेवल घटाने के लिएमुझ […]

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हास्य कविता-शादी की सालगिरह

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

हास्य कविता-शादी की सालगिरह आते ही शादी की सालगिरहपत्नी जी मुस्काईकहने लगीमेरे हमसफर आपको बधाई पति महोदय बधाई पाकरसर खुजाने लगेझंडू बाम सर में लगाने लगे पत्नी बोलीख़ुशी के दिन आपको भलाक्या हो जाता हैबधाई देने परसर दर्द उमड़ आता है पति बोले-अरे भाग्यवानशादी के लिएमुश्किल से धन जुटाया थाबैंड बाजे बाराती मेंधन लुटाया था

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दीपक पर कविता

हिंदी कविता

दीपक पर कविता दीया जलाएं- सुरंजना पाण्डेय माना कि चहुँओर घोर तमस हैअन्धियारा घना छाया बहुत हैं। पर दीया जलाना कब मना हैआईए हम मन में विश्वास काएक दीया तो ऐसे जलाएं। हम सब हर दिन कुछ ऐसे बिताएं खुशियों का करें हम ईजाफा। खुशियों को चहुँदिशों जगमगाएं एक दिया हो मन में ओज का,

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छेरछेरा तिहार के सुग्घर कविता

हिंदी कविता

छेरछेरा तिहार के सुग्घर कविता छेरछेरा – अनिल कुमार वर्मा होत बिहनिया झोला धरके,सबो दुआरी जाबो।छेरछेरा के दान ल पाके,जुरमिल मजा उड़ाबो।।फुटगे कोठी बोरा उतरगे, सूपा पसर ले मुठा उतरगे। नवा जमाना आगे संगी, मुर्रा लाडू कहाँ पाबो।छेरछेरा के दान ल पाके,जुरमिल मजा उड़ाबो।।सेमी के मड़वा कोठा म पड़वा,ढेकी सिरागे नंदागे जतवा।डबर रोटी के पो

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हे पार्थ ! सदा आगे बढ़ो तुम- आशीष कुमार

हिंदी कविता

हे पार्थ ! सदा आगे बढ़ो तुम हे पार्थ ! सदा आगे बढ़ो तुमकर्तव्य पथ पर डटो तुममुश्किलों का सामना करोतूफान के आगे भी अड़ो तुमहे पार्थ ! सदा आगे बढ़ो तुमकर्तव्य पथ पर डटो तुम तुम्हारा कर्म ही तुम्हारी पहचान बनेगाचिरकाल तक तुम्हारा नाम करेगालोभ मोह क्रोध पाप को तजो तुमसत्य निष्ठा नेकी का

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परोपकार पर हिंदी में कविता

समाज और यथार्थ

परोपकार पर हिंदी में कविता परोपकार पर कविता-सुधीर श्रीवास्तव संवेदनशील भावसंवेदनाओं के स्वर परोपकार की निःस्वार्थ भावनागैरों की चिंता से जोड़करस्वेच्छा से सामने वाले की पीड़ा से/मर्म सेखुद को जोड़ने की कोशिश हीपरोपकार है।बिना लोभ मोह अपने पराये के भेद किये बिनाकिसी का सहयोग/सहायता हीतो परोपकार है,हमारे द्वारा किया गयापरोपकार ही तो हमारी खुशियों का

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संस्कार(जीवन मूल्य) पर हिंदी कविता-सुरंजना पाण्डेय

हिंदी कविता

संस्कार(जीवन मूल्य) पर हिंदी कविता बलिदानों को क्यूँ कर रहे तिजारत यूंदेश को क्यूँ बाट रहे हर रोज रहे हम यूं। अपनी देश की मिटटी को क्यों कर रहे यूं अपमानित क्यूँ अपनी ओछी हरकतों से। उठा रहे क्यूँ अपनो पे यूं शमशीरे तुम क्यूँ तौल रहे अपनो को यूं रख के तराजू में। जाति

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जीवन मूल्य पर आधारित कविता-राजकिशोर धिरही

नारी जीवन और संवेदना

जीवन मूल्य पर आधारित कविता कोई भी विपदा आ जाए,कभी नहीं घबराना।बाधाओं से लड़कर के ही,हमको बढ़ते जाना।। सत्य मार्ग में चलकर के हम,लक्ष्य सदा पा सकते ।कठिन डगर भी हो फिर भी हम,मंजिल तक जा सकते।। अधिकार मिले जो भी हमको,उसको पढ़ना होगा।वंचित करना चाहे हमको,आगे बढ़ना होगा।। भाईचारे की चाहत रख,प्रेम शांति से

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सेवा -प्रेम आधारित कविता-डॉ शशिकला अवस्थी

प्रकृति और पर्यावरण

सेवा -प्रेम आधारित कविता सेवा ,प्रेम पुण्योदय से हो जाओ मालामाल।प्रभु खुशियों से झोली भर कर, हे मानव तुम्हें कर देंगे खुशहाल। जनहित के कार्य करो, कोई ना रहे बेहाल।परमार्थ में जीवन बीते,सबके जीवन में,उड़ाओ खुशी गुलाल।मन, कर्म ,वचन से सबके कष्ट हरो, तुम हो भारत माता के लाल।प्रकृति पर्यावरण के संरक्षक बनो ,भारत मातृभूमि

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बाबूलाल शर्मा के लावणी छंद

समाज और यथार्थ

बाबूलाल शर्मा के लावणी छंद काव्य रंगोली- लावणी छंद पूजा की थाली सजती हैअक्षत पुष्प रखें रोली।काव्यजगत में ध्रुव सी चमके,कवि प्रिया,काव्य रंगोली। हिन्दी साहित सृजन साधना,साध करे भाषा बोली।कविता गीत गजल चौपाई,लिखे कवि काव्य रंगोली। दोहा छंदबद्ध कविताई,मुक्तछंद,प्रीत ठिठोली।प्रेम रीति शृंगार सलौने,पढ़ि देख काव्य रंगोली। लिखे सभी पर्व की बातें,ईद दीवाली व होली।गंगा जमनी

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बाबूलाल बौहरा के कुण्डलियाँ छंद

समाज और यथार्थ

बाबूलाल बौहरा के कुण्डलियाँ छंद संवेदना -कुण्डलिया छंद होती है संवेदना, कवि  पशु  पंछी  वृक्ष।मानव मानस हो रहे, स्वार्थ पक्ष विपक्ष।स्वार्थ पक्ष विपक्ष, शून्य  संवेदन  बनते।जाति धर्म के वाद,बंधु आपस में तनते।भूल रहे संस्कार,खो रहे संस्कृति मोती।हो खुशहाल समाज,जब संवेदना होती। बढ़ती  है  संवेदना, राज  धर्म संग  साथ।व्यक्ति वर्ग समाज भी,रखें मनुजता माथ।रखें मनुजता माथ,

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बाबूलाल शर्मा बौहरा के नवगीत

हिंदी कविता

बाबूलाल शर्मा बौहरा के नवगीत कहानी मोड़ मन मानस कहानी मोड़ मन मानसउदासी छोड़नी होगी।पिपासा पीर विश्वासीनिराशा भूल मन योगी।। गरीबी की नहीं गिनतीदुखों का जब पहाड़ा होनही बेघर नदी समझोकिनारा तल अखाड़ा ।वृथा भटको नहीं बादलविरह पथ दर्द संयोगी।,। उजाले भूल मन चातकअँधेरे सिंधु से ले लोबहे सावन दृगों से हीअकालों का यजन झेलोबहे

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