मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

कोई विश्वास पवित्र नहीं

हिंदी कविता

कोई विश्वास पवित्र नहीं मैंने देखा एक रोगी—खुलकर बोला, “दवा नहीं चाहिए,मुझे अपनी बीमारी प्यारी है।”कम से कम वह अपने पागलपन में ईमानदार था। पर अधिक खतरनाक है वह,जो मान लेता है कि बीमार है,फिर झूठी दवा थाम लेता है,और मुस्कुराता है,जैसे वह ठीक हो रहा हो।वह न केवल बीमार है,बल्कि चालाक भी है।और उसकी

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बढ़ो, केवल चमको मत

हिंदी कविता

बढ़ो, केवल चमको मत खुद में निवेश करो।दिखावे में नहीं। ईंधन भरो—ज्ञान, कर्म, साधना की।ना कि चमकते आभूषणों की। हीरे जड़ दो डैशबोर्ड में,सोने की हँसी लगाओ दरवाजों पर,पर इंजन को मत भूलो।वरना रॉयल दिखोगे,पर कहीं नहीं पहुँचोगे। समय, ऊर्जा, ध्यान—यह असली इंजन है।छोटे झूठे आभूषणरुकावट बन जाते हैं। वह व्यक्ति जो नई घड़ी पहनता

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अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो

हिंदी कविता

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो कोई कमजोर नहीं है।हम बस नाटक करते हैं। सुविधा के लिए टूटते हैं।रीढ़ बेचते हैं।और कहते हैं—“ठीक है, मैं ऐसा ही हूँ।” हम सजाते हैं अपनी कमजोरी।तर्क बनाते हैं।सद्गुणों में बदल देते हैं। पर सच यही है—जिसे तुम सहते रहो,वह बढ़ता है। कमजोर स्व को तिरस्कार दो।उसे पालना बंद

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कर्मकांड पे व्यंग्य: रैप सॉन्ग (सरल शब्दों में)

आध्यात्म और भक्ति, हिंदी कविता

[Intro]पूजा-पाठ का मेला है,दिखावे का सब खेला है।गंगा में नहाया, पर मन में मैल,कर्मकांड में अटके, टोटल फैल। [Verse 1]सफेद कपड़ा, मन काला,धूप-बत्ती से क्या बदले लाला?पंडित बोले, “दान-दक्षिणा”,पाप से मुक्ति का ढोंग है साला। सुबह मंदिर, रात में ठेका,भक्ति कम, बस दिखावा फैला।मंत्र पढ़े, पर स्वार्थ छुपाए,भगवान से भी सौदा करवाए! [Hook]कर्मकांड, ओ कर्मकांड,भगवान

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सुधार रणनीति नहीं

हिंदी कविता

सुधार रणनीति नहीं सच्चा सुधार तब शुरू होता है,जब तुम अपने आप से झूठ बोलना बंद करो। जब तुम अपनी स्थिति देखोजैसी है वैसी—बिना सजावट, बिना बहाने। मूल्यांकन चुपचाप हो,किसी को बताने की जरूरत नहीं।घाव पहनने की जरूरत नहीं।पर खुद को सच बताना ज़रूरी है। जब स्पष्टता आती है,परिवर्तन अपने आप होता है।झूठ खुद टूट

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पीठ पीछे कुछ टिक रहा है

हिंदी कविता

पीठ पीछे कुछ टिक रहा है समय को सँभालने के उपाय मत पूछो,खुद को सँभालना सीखो। तुम्हारे घंटे,तुम्हारे मिनट—वे घड़ी नहीं,आईना हैं।उनमें दिखता हैतुम्हारा मन,तुम्हारी प्राथमिकताएँ,तुम्हारे असली मूल्य। ट्रेन छूटे तो समझ आता है—समय लौटता नहीं।मौत छुए तो दिखता है—समय अनंत नहीं,हर सेकंड वाष्पित हो रहा है। पर अजीब भ्रम है—सब कुछ जाएगा,पर मैं नहीं।ट्रेन

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जब मन गुर्राए, सुनो

हिंदी कविता

जब मन गुर्राए, सुनो डर, उथल-पुथल, बेचैनी—इन्हें शत्रु मत समझो।ये तुम्हें डराने नहीं,कुछ बताने आते हैं। जब भीतर सब ठीक नहीं लगता,तो उसे दबाओ मत।पूर्ण शांति तुम्हारी प्रकृति है।उससे कम कुछ भीसंकेत है। मन का अशांत होनाकभी यूँ ही नहीं होता।वह उसी बोझ को ढोता हैजिसे तुमने मूल्य दिया है। जो बेकार है,वह क्यों बचा

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भय झूठा है—परखो उसे

हिंदी कविता

भय झूठा है—परखो उसे डर किसी घटना से नहीं आता,डर आता हैअपने ही टूट जाने की कल्पना से। तुम कहते हो—“कुछ बुरा हो जाएगा।”पर सच यह है—डर खुदसबसे बुरा हो चुका है। घटना नहीं डराती,तुम्हारी नाज़ुकता डराती है।यह मान लेना कितुम सह नहीं पाओगे। अगर तुम कह सको—होने दो जो होना है,दुनिया बिखर जाए,पर मैं

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डर कमजोरी नहीं, संदेश है

हिंदी कविता

डर कमजोरी नहीं, संदेश है डर दुश्मन नहीं है।वह यूँ ही नहीं आता।वह एक संदेश लेकर आता है—यहाँ कुछ अधूरा है। वह बाहर की ओर इशारा नहीं करता,वह भीतर की दरार दिखाता है।जहाँ तुम सत्य में जड़े नहीं हो,जहाँ तुम उधार के सहारों पर खड़े हो। डर कहता है—यहाँ तुम अभी वास्तविक नहीं हो। अगर

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काँपते हाथों से (With Trembling Hands)

हिंदी कविता

काँपते हाथों से (With Trembling Hands) निर्भयताभय का अभाव नहीं है।निर्भयता है—भय के होते हुए भीसही करना। तुम पूछते हो—क्या काँपते हाथसही कर्म कर सकते हैं?हाँ।और उसी मेंएक गहरा आनंद छिपा है। गलत रास्ताअक्सर सहज लगता है।वह तुम्हारी आदतों के साथबहता है।कोई विरोध नहीं,कोई कीमत नहीं। पर सत्य?वह चुनौती देता है।उसकी ओर कदम रखते हीभीतर

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दूर हटने का साहस

हिंदी कविता

दूर हटने का साहस साहस हर चुनौती परतलवार खींच लेना नहीं है।साहस हैयह जान लेनाकौन-सी लड़ाई तुम्हारी हैऔर कौन-सी नहीं। जो लड़ाई तुम्हें परिभाषित करती है,उससे पीछे मत हटो।जहाँ प्रश्न आत्मा का हो,वहाँ समझौता मत करो। पर हर उकसावे परप्रतिक्रिया देनासाहस नहीं है।हर जगह शक्ति दिखानाअपरिपक्वता है। सच्चा शत्रु बाहर नहीं,अंदर है—डर, आदतें,आसक्तियाँ,अहंकार। अधिकतर समस्याएँछलावा

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आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear)

हिंदी कविता

आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear) डर का इलाजआत्मविश्वास नहीं होता।वह केवलडर पर डाला गयाएक मुखौटा है। गोली की तरह—क्षणिक राहत,पर बीमारी जस की तस। डर मिटता नहीं,चुपचाप भीतरऔर गहराता है। निर्भयतासीना तानकर खड़े होने में नहीं,बल्किकिसी के सामनेखड़े होने की ज़रूरत न रहने में है। जब खोने कोकुछ नहीं होता,तो डर किस बात

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