मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

डर कमजोरी नहीं, संदेश है

हिंदी कविता

डर कमजोरी नहीं, संदेश है डर दुश्मन नहीं है।वह यूँ ही नहीं आता।वह एक संदेश लेकर आता है—यहाँ कुछ अधूरा है। वह बाहर की ओर इशारा नहीं करता,वह भीतर की दरार दिखाता है।जहाँ तुम सत्य में जड़े नहीं हो,जहाँ तुम उधार के सहारों पर खड़े हो। डर कहता है—यहाँ तुम अभी वास्तविक नहीं हो। अगर

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काँपते हाथों से (With Trembling Hands)

हिंदी कविता

काँपते हाथों से (With Trembling Hands) निर्भयताभय का अभाव नहीं है।निर्भयता है—भय के होते हुए भीसही करना। तुम पूछते हो—क्या काँपते हाथसही कर्म कर सकते हैं?हाँ।और उसी मेंएक गहरा आनंद छिपा है। गलत रास्ताअक्सर सहज लगता है।वह तुम्हारी आदतों के साथबहता है।कोई विरोध नहीं,कोई कीमत नहीं। पर सत्य?वह चुनौती देता है।उसकी ओर कदम रखते हीभीतर

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दूर हटने का साहस

हिंदी कविता

दूर हटने का साहस साहस हर चुनौती परतलवार खींच लेना नहीं है।साहस हैयह जान लेनाकौन-सी लड़ाई तुम्हारी हैऔर कौन-सी नहीं। जो लड़ाई तुम्हें परिभाषित करती है,उससे पीछे मत हटो।जहाँ प्रश्न आत्मा का हो,वहाँ समझौता मत करो। पर हर उकसावे परप्रतिक्रिया देनासाहस नहीं है।हर जगह शक्ति दिखानाअपरिपक्वता है। सच्चा शत्रु बाहर नहीं,अंदर है—डर, आदतें,आसक्तियाँ,अहंकार। अधिकतर समस्याएँछलावा

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आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear)

हिंदी कविता

आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear) डर का इलाजआत्मविश्वास नहीं होता।वह केवलडर पर डाला गयाएक मुखौटा है। गोली की तरह—क्षणिक राहत,पर बीमारी जस की तस। डर मिटता नहीं,चुपचाप भीतरऔर गहराता है। निर्भयतासीना तानकर खड़े होने में नहीं,बल्किकिसी के सामनेखड़े होने की ज़रूरत न रहने में है। जब खोने कोकुछ नहीं होता,तो डर किस बात

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न जुनून, न दबाव — बस प्रेम

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

न जुनून, न दबाव — बस प्रेम न जुनून की चिंगारी,न दबाव की बेड़ी,काम वहाँ से जन्म लेता हैजहाँ प्रेम चुपचाप बैठा होता है।हम कहते हैं—“पैशन फॉलो करो,”मानो जुनून कोई देवता हो,और विवेक उसका पुजारी।कोई बाज़ार के आगे झुकता है,कोई परिवार के डर से,और कोई अपने जुनून के नाम पर—तीनों अलग दिखते हैं,पर भीतर से

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उद्यमिता : पेशा नहीं, पुकार

हिंदी कविता

उद्यमिता : पेशा नहीं, पुकार पूछना चाहिए—जीवन क्या है?और किस बात सेवह जीने योग्य बनता है?या फिर उद्यमितासिर्फ़ तनख़्वाह से बड़ेअंकों का खेल है? तो तुम शुरुआत करना चाहते हो—ठीक है।पर पहलेखुद से झूठ बोलना बंद करो।बताओ,तुम वास्तव में क्या चाहते होऔर क्यों? अगर यह सफ़रसिर्फ़ अपनी छवि फुलाने के लिए है,मूल्यांकन के गुब्बारे उड़ाने

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टाई में बँधा जंगल

मन और भावनाएँ

टाई में बँधा जंगल शिक्षा क्या है?रोटी कमाने की तरकीबयाऐसा जीवन गढ़ने की कलाजो जीने योग्य हो? एक बात मेंजानवर हमसे बेहतर रहे—उन्हेंअपने होने का बोझ नहीं ढोना पड़ता।न आत्मचेतना का जाल,न आत्मविनाश की योजनाएँ।वे सीधे हैं,सरल हैं,और अपने जंगल मेंईमानदार हैं। मनुष्य भीएक जानवर ही जन्म लेता है,पर उसे मिलाएक खतरनाक उपहार—ऊपर उठने की

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एकांत ही पहला गुरु है

हिंदी कविता

एकांत ही पहला गुरु है अकेलापनदुश्मन नहीं,पहला गुरु है—पर हमउससे लड़ते रहते हैं। हम अकेले नहीं होते,हम अकेले जन्म लेते हैं।जन्म के साथ हीअलगाव का बीजहममें बो दिया जाता है। शिशु रोता हैभूख से नहीं,दर्द से नहीं—सिर्फ इसलिएकि कोई पास नहीं है।माँ की उपस्थितिदूध से पहलेशांति बन जाती है। यही आदतबड़ी होकरअहंकार बन जाती है—एक

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जीवन की सच्ची संगति :अकेलापन

हिंदी कविता

अकेलापनअकेले होने का नाम नहीं,यह तो भीतर की भीड़ है—जहाँ लोग नहीं,अपने ही विचारकंधे से कंधा मिलाकरखड़े रहते हैं। वह व्यक्ति अकेला हैजो अपने साथठीक नहीं है। उसके भीतरतुलनाएँ हैं,इच्छाएँ हैं,शिकायतें हैं,यादों का शोर है। दुनिया भले सामने हो,पर वहअपने ही दिमाग मेंघिरा हुआ है। अकेलापनखाली मेज़ नहीं,एक भरा हुआ रेस्तराँ है—जहाँ हर थालीबासी है,हर

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डेडलाइन से अनुशासन, अनुशासन से मुक्ति

हिंदी कविता

डेडलाइन से अनुशासन, अनुशासन से मुक्ति जिस दिनतुम सच में परिपक्व हो जाओगे,डेडलाइनखुद गिर जाएगी।काम होगा—क्योंकि होना है। पर जब तकवह दिन नहीं आया,डेडलाइन सेनफ़रत मत करो।उसे अपनाओ। डेडलाइनदंड नहीं है—आईना है।वह बताती है:अभी भीतरस्पष्टता पूरी नहीं है। ईमानदारी से कहो—“अगर प्रेम होता,तो आदेश की ज़रूरत नहीं पड़ती।” डेडलाइन इसलिए हैक्योंकिबिना उसकेहम टालते हैं,भागते हैं,सोते

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रोज़ की जीत

हिंदी कविता

रोज़ की जीत महान होनाअतिमानव होना नहीं है।महान होनाअपनी सीमा सेएक क़दम आगे जाना है। जीनायुद्ध में होना है—हर दिन,हर पल। अंतिम विजय परमत अटको।अगर वह आई,तो वहउपहार होगी—लक्ष्य नहीं। असल मायने रखते हैंआज के युद्ध—छोटे,शांत,अदृश्य। रात को सोओयोद्धा बनकर।सुबह उठोयुद्ध जानते हुए। बिना लड़ेकभी मत थको।ईमानदार संघर्ष कीथकान—यही जीत है। दुनिया की तालियाँज़रूरी नहीं।अपनी

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डूबे हो या खोए हुए?

हिंदी कविता

डूबना या खो जाना (अतुकांत कविता) जब सार्थक में डूबते हो,तो फालतू बातेंदरवाज़े पर दस्तक देती हैं,पर भीतर कोई नहीं मिलता—वे लौट जाती हैं,अपमानित, उपेक्षित। सार्थक डूबानमन को इतना भर देता हैकि रिक्तता को जगह नहीं मिलती।ध्यान इतना गहरा होता हैकि तुच्छ आकर्षणकेवल मच्छर-सी भनभनाहट बनकर रह जाते हैं। पर सावधान!हर डूबना साधना नहीं होता।कुछ

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