प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

बताइये आप कौन हैं

प्रकृति और पर्यावरण

बताइये आप कौन हैं कुछ लोग हामी भरने मेंबड़े माहिर होते हैंपर काम कुछ भी नहीं करतेउनके मुख से हमेशानिकलता है हाँ-हाँ-हाँइनके शब्दकोश में ‘ना’ शब्द नहीं होताये कभी ना कहते ही नहींज़बान से कभी मुकरते ही नहींकाम करो या न करोइनके लिए हाँ कहना ही स्वामीभक्ति होती है कुछ लोग हाँ कहने के बादकाम […]

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प्यासा पंछी पर कविता-प्रेमचन्द साव

प्रकृति और पर्यावरण

प्यासा पंछी पर कविता मन है उदास भटकता फिरे ।जैसे प्यासा पंछी उड़ता फिरे ।मन को ना कोई बांध सके। तो खुले आकाश की खोज करे ।मन की उड़ान खुशियों की पुकार करे ।जैसे प्यासा पंछी उड़ता फिरे । फूलों में भौंरे जैसे गुंजन करे ।मन की इच्छा वैसे ही हिलोरे करे ।जैसे प्यासा पंछी

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Jai Sri Ram kavitabahar

श्रीराम पर कविता / डॉ एन के सेठी

प्रकृति और पर्यावरण

श्रीराम पर कविता / डॉ एन के सेठी मर्यादा श्री राम की, जीवन में अपनाय।अहंभाव को त्यागकर,सदा नम्र बन जाय।।1।। सेवक हो हनुमान सा,होय न हिम्मत हार।लाय पहाड़ उठायके, करें दुखों से पार।।2।। अंत दशानन का हुआ, हुई राम की जीत।अहं भाव को त्यागकर, करो राम से प्रीत।।3।। रामचरित से सीख लें, संबंधों का मान।करें

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सर्वश्रेष्ठता पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

सर्वश्रेष्ठता पर कविता एकअदना जीवबेबस कर दियाअसहाय-त्रस्त-सहमा मानव,छुप बैठा अपनों से बचकर,जो हर कोण ढाल से,अपनों सा दिखते हैं.लेकिन पहचान नहीं बताते आसानी से. अब उनमें वहीं नहींबल्कि कोई और भी है.जो जान पर तूला है.हाय! ये मानव कुछ तो भूला है.नहीं तो ये प्रकृति ,हमारी भी है मां.सच!उसे पता हैसंतुलन कैसे है रखना?परिवर्तन उसका

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याराना पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

याराना पर कविता साहिल पर आना मेरे यार मुझे तेरी याद सताती हैतेरी बातें मुझे बीते कल की याद दिलाती हैंसाहिल पर आना मेरे यार मुझे तेरी याद सताती है।1)जब तू मुझे कभी बुलाता हैयादों की सेज पर सुलाता हैवो प्रेम भरी शय्या मुझको जल्दी सुलाती हैसाहिल पर आना———————-॥ 2)जब तू मुझे कभी भी मिलता

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ऋतुराज बसंत पर दोहे

प्रकृति और पर्यावरण

ऋतुराज बसंत पर दोहे धरती दुल्हन सी सजी,आया है ऋतुराज।पीली सरसों खेत में,हो बसंत आगाज।।1।। कोकिल मीठा गा रही,भांतिभांति के राग।फूट रही नव कोंपलें , हरे भरे हैं बाग।।2।। पीली चादर ओढ़ के, लगती धरा अनूप।प्यारा लगे बसंत में, कुदरत का ये रूप।।3।। हरियाली हर ओर है , लगे आम में बौर।हुआ शीतअवसान है,ऋतु बसंत

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बसन्त आयो रे पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

बसन्त आयो रे पर कविता ऋतु बसन्त शुभ दिन आयो रे,सबके मन को भायो रे।पात-पात हरियाली सुन्दर,मधु बन भीतर छायो रे।। नीला अम्बर खूब सितारेसबके मन को भाते हैं।रक्त पलास खिले धरती पर,तन में अगन लगाते हैं।रंग-बिरंगे उपवन सुन्दर,प्रकृति खूब हर्षायो रे।ऋतु बसन्त खूब दिन आयो रे,……….। आम्र बौर अमराई खिलकर,पिय सन्देशा लाती है।कामुकता का

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सुंदरता पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

सुंदरता पर कविता *प्रकृति की सुंदरता को देखकर,**मेरा मन प्रसन्न हो गया,**प्रकृति की गोद मे अपनी सारी जिंदगी यही कही खो गया,**कभी सुखी धरा पर धूल उड़ती है,**तो कभी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है,**प्रकृति की सुंदरता हो ना हो,**उसमे सादगी होना चाहिए,**प्रकृति मे खूशबू हो ना हो,**उसमे महक होना चाहिए,**प्रकृति मे हमेशा सुंदरता हो

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भोर गीत-राजेश पाण्डेय वत्स

प्रकृति और पर्यावरण

भोर गीत ये सुबह की सुहानी हवाये प्रभात का परचम।प्रकृति देती है ये पलरोज रोज हरदम।। आहट रवि किरणों कीसजा भोर का गुलशन।कर हवाओं संग सैरभर ले अपना दामन।। उठ साधक जाग अभीदिन मिले थे चार।बीते न ये कीमती पलखो न जाये बहार।। कदम बढ़ा न ठहर अभीमंजिल आसमान में।स्वर्ग बना धरा को औरराम नाम

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बाँके बिहारी बरबीगहीया – छठ पर्व आधारित कविता

प्रकृति और पर्यावरण

छठ पर्व आधारित कविता शुक्ल पक्ष पष्ठी  तिथि कोकार्तिक मास में आती है ।सूर्य की प्रिय बहन प्रकृति छठी मईया कहलाती है ।सूर्योपासना का महान पर्व मेंछठी माँ दिव्य रूप दिखाती है।महान व्रत इस छठ पर्व मेंकरतीं छठवर्ती आदित्य का ध्यानप्रभु सविता और छठी मईया कोजगत आज करें दंड प्रणाम ।।  लोक आस्था का यह महापर्वशुद्ध

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वर्षा ऋतु कविता – कवयित्री श्रीमती शशिकला कठोलिया

प्रकृति और पर्यावरण

वर्षा ऋतु कविता  ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड तपिश, प्यासी धरती पर वर्षा की फुहार,       चारों ओर फैली सोंधी मिट्टी,प्रकृति में होने लगा जीवन संचार। दिख रहा नीला आसमान ,सघन घटाओं से आच्छादित ,वर्षा से धरती की हो रही ,श्यामल सौंदर्य द्विगुणित ।  छाई हुई है खेतों में ,सर्वत्र हरियाली ही हरियाली ,नाच रहे हैं

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वर्षा ऋतु पर कविता -हरीश पटेल

प्रकृति और पर्यावरण

वर्षा ऋतु पर कविता आज धरा भी तप्त हुई है।हृदय से शोले निकल पड़े हैं।।कण-कण अब करे पुकार ।आ जाओ वर्षा एक बार।। प्यास अब उमड़ चुकी है ।जिंदगी को बेतरतीब कर विक्षिप्त पड़ा है।।तुम पहली बूंद बन कर आ जाना ।तुम वर्षा हो आकर बरस जाना ।।निर्जीव सदृश यह काया है, रूह बनकर समा

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