प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

atal bihari bajpei

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता मानवता के प्रेणता थे।            राष्ट के जन नेता थे।भारत माँ के थे तुम लाल।       प्रजातंत्र में किया कमाल।।विरोधी भी कायल थे।         दुश्मन भी घायल थे।।पत्रकार व कवि सुकुमार।        प्रखर वक्ता में थे सुमार।।जीवन की सच्चाई लिखने वाले।     सबके दिलो को जीतने वाले।।तुम्हारे मृत्यु पर दुनिया रोया है।आसमान मे घने कोहरे होया […]

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व्यक्तित्व विशेष कविता संग्रह

23 जुलाई लोकमान्य तिलक जयन्ती पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

इसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में बाल गंगाधर तिलक का नाम सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। उन्होंने हमारे देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से मुशायरे में शामिल किया था। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि के चिक्कन गांव में जन्‍म हुआ था। • द्वारकाप्रसाद गुप्त ‘रसिकेन्द्र’ जय

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आकर्षण या प्रेम पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

आकर्षण या प्रेम मीरा होना आसान नहीं,ज़हर भी पीना पड़ता है।त्याग, प्रेम की परिभाषा,जीवंत निभाना पड़ता है।। हीर रांझा, लैला मंजनू,अब नहीं कहीं मिलते हैं।दिल में दिमाग उगे सबके,प्रेम का व्यापार करते हैं।। सुंदर प्रकृति, सुंदर लोग,दिल लुभावने लगते हैं।पर आकर्षण के वशीभूत,प्रेम कलंकित भी करते हैं।। नहीं होता वो प्रेम कतई,जो सुंदरता से उपजा

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किसान खेत जोतते हुए

सावन पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

सावन-सुरंगा सरस-सपन-सावन सरसाया ।तन-मन उमंग और आनंद छाया ।‘अवनि ‘ ने ओढ़ी हरियाली ,‘नभ’ रिमझिम वर्षा ले आया । पुरवाई की शीतल ठंडक ,सूर्यताप की तेजी, मंदक । पवन सरसती सुर में गाती ,सुर-सावन-मल्हार सुनाती । बागों में बहारों का मेला ,पतझड़ बाद मौसम अलबेला । ‘शिव-भोले’ की भक्ति भूषित ,कावड़ यात्रा चली प्रफुल्लित ।

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हाइकु

निमाई प्रधान’क्षितिज’ के हाइकु

प्रकृति और पर्यावरण

निमाई प्रधान’क्षितिज’ के हाइकु *[1]* *हे रघुवीर!**मन में रावण है* *करो संहार ।* *[2]**सदियाँ बीतीं* *वहीं की वहीं टिकीं* *विद्रूपताएँ ।* *[3]**जाति-जंजाल**पैठा अंदर तक**करो विमर्श ।* *[4]**दुःखी किसान* *सूखे खेत हैं सारे* *चिंता-वितान* *[5]**कृषक रुष्ट* *बचा आख़िरी रास्ता* *क्रांति का रुख़* *[6]**प्रकृति-मित्र!**सब भूले तुमको**बड़ा विचित्र!!* *[7]* *अथक श्रम* *जाड़ा-घाम-बारिश* *नहीं विश्राम* *[8]**बंजर भूमि**फसल कहाँ से

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बारिश पर कविता हिन्दी में

प्रकृति और पर्यावरण

यहां बारिश पर कविता हिन्दी में दिए जा रहे हैं आप इनको पढ़के आनंद लें। बारिश का मौसम सर सर सरसराता समीरचम चम चमकती चपलाथम थम कर टपकती बूँदेंअनेक सौगात लाती बहारेंप्रेम का, खुशियों काबारिश के मौसम का। घनश्याम घिरे नभ घन मेंहरित धरा राधे की आँचलघनघोर बरसता पानी मध्य मेंलगता ज्यों खीर सागर बीच

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भोर का तारा एक आशावादी कविता

प्रकृति और पर्यावरण

भोर का तारा पद्ममुख पंडा के द्वारा रचित आशावादी कविता है जिसमें उन्होंने प्रकृति का बेहद सुंदर ढंग से वर्णन किया है। साथ में यह भी बताया है कि किस तरह से रात्रि के बाद दिवस हो रहा है अभिप्राय दुख के बाद सुख का आगमन हो रहा है। भोर का तारा. एक आशावादी कविता

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इश्क पर कविता -सुशी सक्सेना

प्रकृति और पर्यावरण

इश्क पर कविता -सुशी सक्सेना इश्क के आगे कलियों की तरूणाई फीकी है।इश्क में तो हर इक शय जी लेती है।इश्क से आसमां की ऊंचाई झुक जाती है।इश्क में नदियों की लहराई भी रुक जाती है।इश्क से सागर भी कम गहरा लगता है।इश्क में सारी दुनिया का पहरा लगता है।इश्क में पत्थर भी पिघल जाता

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सादा जीवन पर कविता -मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण

सादा जीवन पर कविता –मनीभाई नवरत्न एक ओर रंगशालादूसरी ओर रंग सादा।कोई टक्कर नहीं जिनके बीचकौन सुरमा है ज्यादा?वैसे ख्याति विविध रंगों की हैहरा लाल पीला नीलाये ना होते तोकहने वाले राय मेंदुनिया बेरंग होती ।पर जरा सोचो तोरंगों की उत्पत्ति कहां से हुई ?प्रकृति की छटा बिखेरती इंद्रधनुषकैसे प्रकट हुआ ?सूर्य की श्वेत रश्मि

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नई भोर हुई – सुशी सक्सेना

प्रकृति और पर्यावरण

. नई भोर हुई – सुशी सक्सेना नई भोर हुई, नई किरन जगी।भूमि ईश्वर की, नई सृजन लगी। नई धूप खिली, नई आस पली,ओढ़ के सुनहरी चुनरी प्रकृति हंसी,नया नया सा आकाश है, नये नज़ारे,नववर्ष में कह दो साहिब, हम तुम्हारेसुनकर जिसे, मन में तपन लगी। नववर्ष में है, बस यही मनोकामना,दंश झेले जो हमने

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वक्त पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

वक्त पर कविता पलटी खाता वक्त बेवक्त, मुंह बिचका के चिढ़ाता है। किया धरा पानी फिराता, वक्त ओंधे मुंह गिराता है।। सगा नहीं किसी का वक्त, हर वक्त चलता रहता है। कभी धूप कभी छांव सा, स्वरूप बदलता रहता है।। कच्ची धूप ओस की बूंद, प्रकृति को निहलाती है। तेज़ धूप झुलसाती तपन, अंत में

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jai durga maa

दुर्गा मैया पर कविता – सुशी सक्सेना

प्रकृति और पर्यावरण

दुर्गा या आदिशक्ति हिन्दुओं की प्रमुख देवी मानी जाती हैं जिन्हें माता, देवी, शक्ति, आध्या शक्ति, भगवती, माता रानी, जगत जननी जग्दम्बा, परमेश्वरी, परम सनातनी देवी आदि नामों से भी जाना जाता हैं। शाक्त सम्प्रदाय की वह मुख्य देवी हैं। दुर्गा को आदि शक्ति, परम भगवती परब्रह्म बताया गया है। दुर्गा मैया पर कविता आओ

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