प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

स्वच्छता अभियान चाहिए

प्रकृति और पर्यावरण

स्वच्छता अभियान चाहिए दया-धर्म करुणामय पावनअधरोंपर मुस्कान चाहिए।अनमोल मानव जीवनमें स्वच्छता अभियान चाहिए। परमार्थ परहित पुरुषार्थ क्षमा शीलता दान चाहिए।स्वच्छता से नेक कमाई भोजन वस्त्र मकान चाहिए। देशधर्म सत्कर्म सुपावन प्रगतिपथ कल्यान चाहिए।नेकी भलाई पुण्य में भी स्वच्छता अभियान चाहिए। बन्धुत्व एकत्व समत्व का निज अंतः में भान चाहिए।हरि दिखे हर-हर में हरदम ऐसा सुमिरन […]

स्वच्छता अभियान चाहिए Read More »

आगे हरेली तिहार – रविन्द्र दुबे बाबू

प्रकृति और पर्यावरण

आगे हरेली तिहार झूम झूम के सावन आगे, बादर करिया अमावस ममजा उडाबो,माटी मतियाबो, हरेली पहली तिहारी हे ।। बिहन ले गाँव के टुरा जुड़ गे , नरियर फेकेन जम के, गेड़ी खपायेन टेंग टेंग रेंगेन, झूमत संग संगवारी हे ।। नागर फांद के चीला खवाइश, भूति करे बनिहारिनछत्तीसगढ़ म हरियाली छाए, खेत खार आउ

आगे हरेली तिहार – रविन्द्र दुबे बाबू Read More »

स्वास्थ्य पर सजगता – विनोद सिल्ला

प्रकृति और पर्यावरण

स्वास्थ्य पर सजगता सेहत सुविधा कम हुई, बढ़े बहुत से रोग| दाम दवाओं के बढ़े, तड़प रहे हैं लोग|| अस्पताल के द्वार पर, बड़ी लगी है भीड़|रोग परीक्षण हो रहे, सब की अपनी पीड़|| ऊंचे भवन बना लिए, पैसा किया निवेश|दूर हुआ जब प्रकृति से, पनपे सभी कलेश|| खान-पान बदले सभी, फास्ट-फूड परवान|रोगों की भरमार

स्वास्थ्य पर सजगता – विनोद सिल्ला Read More »

धर्म की कृत्रिमता पर कविता-नरेंद्र कुमार कुलमित्र

प्रकृति और पर्यावरण

धर्म की कृत्रिमता पर कविता कृत्रिम होती जा रही है हमारी प्रकृति-03.03.22—————————————————-हिंदू और मुसलमान दोनों कोठंड में खिली गुनगुनी धूप अच्छी लगती हैचिलचिलाती धूप से उपजी लू के थपेड़ेदोनों ही सहन नहीं कर पाते हिंदू और मुसलमान दोनोंठंडी हवा के झोंकों से झूम उठते हैंतेज आंधी की रफ्तार दोनों ही सहन नहीं कर पाते हिंदू

धर्म की कृत्रिमता पर कविता-नरेंद्र कुमार कुलमित्र Read More »

मनीभाई नवरत्न की १० कवितायेँ

प्रकृति और पर्यावरण

हाय रे! मेरे गाँवों का देश -मनीभाई नवरत्न हाय रे ! मेरे गांवों का देश ।बदल गया तेरा वेश। सूख गई कुओं की मीठी जल ।प्यासी हो गई हमारी भूतल ।थम गई पनिहारों की हलचल ।क्या यही था विकास का पहल ?क्या यही है अपना प्रोग्रेस ?हाय रे! मेरे गांवों का देश । भूमि बनती

मनीभाई नवरत्न की १० कवितायेँ Read More »

doha sangrah

प्रकृति विषय पर दोहे

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

प्रकृति विषय पर दोहे सूरज की लाली करें,इस जग का आलोक।तन मन में ऊर्जा भरे,हरे हृदय का शोक।। ओस मोतियन बूँद ने,छटा बनाकर धन्य।तृण-तृण में शोभित हुई,जैसे द्रव्य अनन्य।। डाल-डाल में तेज है, पात-पात में ओज।शुद्ध पवन पाता जगत,हरियाली में रोज।। उड़कर धुंध प्रभात में,भू पर शीत बिखेर।पुण्य मनोरम दृश्य से,लिया जगत को घेर।। झूम

प्रकृति विषय पर दोहे Read More »

जिन्दगी पर कविता – पुष्पा शर्मा

प्रकृति और पर्यावरण

जिन्दगी का मकसद रोज सोचती हूँ।जिन्दगी का मकसदताकती ही रहती हूँमंजिल की लम्बी राह। सोचती ही रहती हूँप्रकृति की गतिविधियाँ,जो चलती रहती अविराम।सूरज का उदय अस्तरजनी दिवस का निर्माण। रात का अंधियारा करता दूरचाँद की चाँदनी का नूर।तारों की झिल मिल रहतीअँधेरी रातों का भय हरती। शीतल समीर संग होता सवेरा,परीन्दों के कलरव ने सृष्टि

जिन्दगी पर कविता – पुष्पा शर्मा Read More »

सागर- मनहरण घनाक्षरी

प्रकृति और पर्यावरण

सागर- मनहरण घनाक्षरी पोखर व झील देखो , जिसमें न गहराई ,थोड़ा सा ही जल पाय, मारते उफान हैं I सागर को देखो वहाँ , नदियाँ हैं कई जहाँ ,सबको  समेट   हिय , करे  न  गुमान  है I जिसका न ओर छोर , दिल में अथाँह ठोर ,सबको  ही  एक  रस , देता  सम्मान  है 

सागर- मनहरण घनाक्षरी Read More »

बसन्त की सौगात – रमेश कुमार सोनी

प्रकृति और पर्यावरण

बसन्त की सौगात – रमेश कुमार सोनी शरमाते खड़े आम्र कुँज में कोयली की मधुर तान सुन बाग-बगीचों की रौनकें जवां हुईंपलाश दहकने को तैयार होने लगे पुरवाई ने संदेश दिया कि-महुए भी गदराने को मचलने लगे हैं। आज बागों की कलियाँ उसके आने से सुर्ख हो गयी हैं ज़माने ने देखा आज ही सौंदर्य

बसन्त की सौगात – रमेश कुमार सोनी Read More »

गांधी जी के विचार – जगदीश कौर प्रयागराज

प्रकृति और पर्यावरण

गांधी जी के विचार – जगदीश कौर प्रयागराज गांधी तेरे विचारों की फिर जरूरत है ।सत्य, अंहिसा, रामराज्य की हसरत है। मानव को मानव का दर्जा मिल जाए ।मंहगाई में सबका खर्चा चल जाए।इंसानियत न बिके सरेआम बाजारों में ।पढा लिखा वर्ग न खडा हो हजारों में।अब फिर से अंहिसा का दे आ पाठ पढ़ा

गांधी जी के विचार – जगदीश कौर प्रयागराज Read More »

सेवा -प्रेम आधारित कविता-डॉ शशिकला अवस्थी

प्रकृति और पर्यावरण

सेवा -प्रेम आधारित कविता सेवा ,प्रेम पुण्योदय से हो जाओ मालामाल।प्रभु खुशियों से झोली भर कर, हे मानव तुम्हें कर देंगे खुशहाल। जनहित के कार्य करो, कोई ना रहे बेहाल।परमार्थ में जीवन बीते,सबके जीवन में,उड़ाओ खुशी गुलाल।मन, कर्म ,वचन से सबके कष्ट हरो, तुम हो भारत माता के लाल।प्रकृति पर्यावरण के संरक्षक बनो ,भारत मातृभूमि

सेवा -प्रेम आधारित कविता-डॉ शशिकला अवस्थी Read More »

Scroll to Top