प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

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शाकाहारी जीवन / देवेंद्र चरण खरे आलोक

प्रकृति और पर्यावरण

शाकाहारी जीवन करें व्यतीत जन्म हुआ मानव का लेकर ,सौम्य प्रकृति आधार।तृण- तृण इसके रग- रग में है,रचता रहता सार।अंग सभी प्रत्यंग सजे हैं,सात्विक शक्ति शरीर,मन का मनका प्रस्तुत करता ,मन ही मन आभार। है विकास के पथ पर चलता,रज कण लिए शरीर।मज्जा रक्त अस्थियां पोषण,पाने हेतु अधीर।हारमोन है घ्रेलिन नामक, बढे़ भूख आहार,सम्यक नींद

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शाकाहारी भोजन/ हरि प्रकाश गुप्ता

प्रकृति और पर्यावरण

शाकाहारी भोजन अपनाइए भोजन अपनी अपनी पसंद का सभी का होता है।कोई मांसाहारी तो कोई शाकाहारी होता है ।।कुछ कहते मांसाहारी अच्छा होता है।कोई शाकाहारी को अच्छा कहता है ।।अपनी अलग-अलग सोच पर सभी कुछ निर्भर करता है।कहते हैं और सुना जंगली जानवरमांसाहारी होते हैं।फिर इंसान शाकाहारी छोड़क्यों मांसाहारी होते हैं।।शाकाहारी भोजन कर जीव जंतु

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भगवान पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

भगवान पर कविता: किसी भी धर्म में खास कर के हिन्दू धर्म में भगवानो पर बढ़ी आस्था रखी जाती है और इन भगवानो पर वे बहुत ज्यदा विस्वास रखते है और इस आस्था को बनाये रखे कविता बहार आप के लिए कुछ कविताएँ बताती है जो इस प्रकार है. भगवान पर कविता शब्दों से परे

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गीत नवगीत लिखें

प्रकृति और पर्यावरण

गीत नवगीत लिखें ग़ज़ल रुबाई या फिर कविता, भले गीत नवगीत लिखें। मन के भाव पिरोते जायें, जैसा करें प्रतीत लिखें। देख बदलते अंबर के रँग, काव्य तूलिका सदा चले।छाया से सागर रँग बदले, लहरें तट से मिलें गले।लाल गुलाबी श्वेत श्याम या, नीला धानी पीत लिखें।ग़ज़ल रुबाई या फिर कविता, भले गीत नवगीत लिखें।

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पिया जी देखो वसंत आ गया

प्रकृति और पर्यावरण

पिया जी देखो वसंत आ गया पेड़ो के झुरमुट से आतीकोयल की मीठी बोलीफूलों की हर कली पर देखोमतवाले भवरों की टोलीआम वृक्ष मंजरी व टिकोरो से लदबद गया ।पिया जी देखो वसंत आ गया ।। बेल वृक्ष पर आये नए फूलपौधो की अनुपम हरियालीनव पल्लव का पालना डालेप्रकृति नभी लाई खुशहालीटेसू के दहकते फूल

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मधुमासी चौपाइयाँ

प्रकृति और पर्यावरण

मधुमासी चौपाइयाँ शरद शिशिर ऋतु कब के बीते, हाथ प्रकृति के रहे न रीते।दिनकर चले मकर के आगे, ठंडक सूर्य ताप से भागे।1बासंती मधुमास महीना, सर्व सुगन्धित भीना- भीना।घिरा कुहासा झीना-झीना, धरा सजी ज्यों एक नगीना।2कलियों पर हैं भ्रमर घूमते, ऋतु बसंत को सभी पूजते।मादकता वन उपवन छाई, आतुरता हर हृदय समाई।3नये पात आये तरुओं

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वो स्काउट कैम्प है मेरा

प्रकृति और पर्यावरण

वो स्काउट कैम्प है मेरा जहाँ प्रकृति की सुंदर गोदी में स्काउट करता है बसेरावो स्काउट कैम्प है मेराजहाँ सत्य सेवा और निष्ठा का हर पल लगता है फेरावो स्काउट कैम्प है मेरायह धरती जहाँं रोज फहरता,नीला झण्डा हमाराजहाँ जंगल में मंगल करता है,स्काउट वीर हमाराजहाँ शिविर संचालक सबसे पहले डाले तम्बू डेरावो स्काउट कैम्प

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जीवन का शाश्वत सत्य

प्रकृति और पर्यावरण

जीवन का शाश्वत सत्य भोर की बेला हुई, दिनकर की पलकें खुली।इंतज़ार ख़त्म हुआ, सौगात लेकर आई नयी सुबह।।धीरे धीरे आँखे खोल रहा,स्वर्ण किरणें बिखेर रहा।नयी सुबह प्रारंभ हुई, रात्रि निशा विभोर हुई।। कल जो जा रहा पश्चिम में था,आज फिर पूरब में है।नयी रोशनी नयी किरण आज हमारे जीवन में है।।दे रहा संकेत हमें,

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