आओ मिलकर सब खेलें खेल
मन और भावनाएँआओ खेलें खेल
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खेल खेलना हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है । खेल खेलने से हमारा स्वस्थ भी ठीक रहता है और शरीर में भी फूर्ती रहती है ।
आओ खेलें खेल जीवन के इस दौड़ में,चल थोड़ा शामिल हो जाएं।उत्साह और उमंग से,चल ऐसा अभ्यास करें।स्फूर्ति और चपलता से,नित जीत का नया स्वाद चखें।तोड़ डालें पूर्वानुमानों को,इतना हम सब आगे बढ़ें।उठो, जागो और मत रुको,जब तक की लक्ष्य ना पा जाओ।आदर्श वाक्य जो अपनाया विश्व ने,और तेज, और ऊंचा और ताकतवर का,सदा चलो
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सदा छला जन का विश्वास विश्वास गीत (१६,१५) सत्ताधीशों की आतिश से,जलता निर्धन का आवास।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। युग बीते बहु सदियाँ बीती,चलता रहा समय का चक्र।तहखानों में धन भर जाता,ग्रह होते निर्बल हित वक्र।दबे भूलते मिले दफीने,फलती मचली मिटती आस।राज महल के षडयंत्रों ने,सदा छला जन का विश्वास। सत्ता
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29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस. ————— आओ खेल खेलें—————– खेल है मानव जीवन का अभिन्न अंग,खेल से छाई जीवन में खुशहाली का रंग।खेल है अनमोल उपहार यह सब को बोलें,जीवन के उद्धार के लिए, आओ खेल खेलें। कोई खेले हॉकी क्रिकेट तो कोई कबड्डी,शरीर हो जाए स्वस्थ और मजबूत- हड्डी।आलसी – जीवन और खेल दोनों
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माँ के आँचल में सो जाऊँ (१६ मात्रिक) आज नहीं है, मन पढ़ने का,मानस नहीं गीत,लिखने का।मन विद्रोही, निर्मम दुनिया,मन की पीड़ा, किसे बताऊँ,माँ के आँचल में, सो जाऊँ। मन में यूँ तूफान मचलते,घट मे सागर भरे छलकते।मन के छाले घाव बने अब,उन घावों को ही सहलाऊँ,माँ के आँचल में सो जाऊँ। तन छीजे,मन उकता
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दोषी पर कविता ( १६,१४ ताटंक छंद ) सामाजिक ताने बाने में,पिसती सदा बेटियाँ क्यों?हे परमेश्वर कारण क्या है,लुटती सदा बेटियाँ क्यों? मात पिता पद पूज्य बने हैं,सुत को सीख सिखाते क्या?जिनके सुत मर्यादा भूले,पथ कर्तव्य बताते क्या? दोष तनय का, यह तो तय है,मात – पिता सच, दोषी है।बेटों को सिर नाक चढ़ाया,यही महा
जन चरित्र की शक्ति भू पर विपदा आजठनी है भारी।संकट में है विश्वप्रजा अब सारी।। चिंतित हैं हर देशविदेशी जन सेचाहे सब एकांतबचें तन तन सेघातक है यह रोगडरे नर नारी।भू पर ……….।। तोड़ो इसका चक्रसभी यों कहतेघर के अंदर बन्दतभी सब रहतेपालन करना मीतनियम सरकारीभू प…………….।। शासन को सहयोगकरें भारत जनतभी मिटेगा रोगसुखी हों
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बादल पर कविता बादल घन हरजाई पागल,सुनते होते तन मन घायल।कहीं मेघ जल गरज बरसते,कहीं बजे वर्षा की पायल।इस माया का पार न पाऊँ,क्यों बादल बिरुदावलि गाऊँ। मैं मेघों का भाट नहीं जो,ठकुर सुहाती बात सुनाऊँ।नही अदावत रखता घन से,बे मतलब क्यों बुरे बताऊँ।खट्टी मीठी सब जतलाऊँ,क्यों बादल बिरुदावलि गाऊँ। पर मन मानी करते बदरा,सरे
बादलो ने ली अंगड़ाई बादलो ने ली अंगड़ाई,खिलखलाई यह धरा भी!हर्षित हुए भू देव सारे,कसमसाई अप्सरा भी! कृषक खेत हल जोत सुधारे,बैल संग हल से यारी !गर्म जेठ का महिना तपता,विकल जीव जीवन भारी!सरवर नदियाँ बाँध रिक्त जल,बचा न अब नीर जरा भी!बादलों ने ली अंगड़ाई,खिलखिलाई यह धरा भी! घन श्याम वर्णी हो रहा नभ,चहकने
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काग चील हँस रहे गीत ढाल बन रहे.स्वप्न साज ढह गए. पीत वर्ण पेड़ हो. झूलते विरह गये देश देश की खबर. काग चील हँस रहे. मौन कोकिला हुई. काल ब्याल डस रहे. लाश लापता सभीमेघ शोक कह गये।पीत…………….।। शून्य पंथ ताकते. रीत प्रीत रो पड़ी. मानवीय भावना. संग रोग हथकड़ी. दूरियाँ सहेज लीधूप ले