पहले से समृद्ध — बस भूल गए
हिंदी कवितापहले से समृद्ध — बस भूल गए तुम्हेंयह सिखाया गया हैकि संपन्नताकुछ पाने से आती है। दौड़ो।जोड़ो।दिखाओ।थामे रहो। धन,संपत्ति,डिग्रियाँ,रिश्ते,प्रतिष्ठा,अनुभव—सबदुनिया से उधार। औरजो दुनिया देती है,वहछीन भी सकती है। जिस प्रतिष्ठा परतुम टिके हो,वहकिसी और कीमान्यता है। आज मिली,कल बदल गई। तुम्हारी छविदूसरों के मन में है—औरमनरातों-रातपलट जाते हैं। धीरे-धीरेतुमजो जोड़ते हो,उसी परनिर्भर होने लगते हो।
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