दिखावे का मन
हिंदी कवितादिखावे का मन लोग आईने में नहीं,आँखों में खुद को देखते हैं—दूसरों की आँखों में। दुकान की रोशनी मेंशर्ट नहीं चुनी जाती,अपनी कीमत तौली जाती है—कहीं सस्ते न पड़ जाएँ हम। गला थोड़ा और खुला,जाँघ थोड़ी और ऊपर,कपड़ा नहीं,स्वीकृति पहनी जाती है। फिर वही मनरिश्तों की अलमारी खोलता है—देखो मेरा साथी,देखो मेरा प्रेम,देखो मेरा जीवन।
