तारों सितारों में तुझे ढूंढता हूँ
प्रकृति और पर्यावरणइस रचना में कवि उस प्रभु को जीवन की विभिन्न कठिन परिस्थितियों में ढूँढने का प्रयास कर रहा है | उस प्रभु को खोज रहा है |
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इस रचना में कवि उस प्रभु को जीवन की विभिन्न कठिन परिस्थितियों में ढूँढने का प्रयास कर रहा है | उस प्रभु को खोज रहा है |
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इस रचना में प्रभु की महिमा का वर्णन है | जिसके सहारे हमारे जीवन को दिशा मिलती है |
सावन की रिमझिम फुहार के बीच संख व डमरू की आवाज मन की जड़ता को हिला देती है। एक नवीन प्रेरणा
अन्तर्मन को ऊर्जान्वित करने लगती है।
प्रकृति प्रेम सबसे बड़ी ईश्वर सेवा है।
श्रावण मास में आराध्य महाशिव विषधारी, भोले भंडारी की स्तुति तांटक छन्दगीत में….
महाशिव भोले भंडारी पर गीत Read More »
कवियों की आपबीती पर कविता शीश महल की बात पुरानी,रजवाड़ी किस्से जाने।हम भी शहंशाह है, भैया,शीश पटल के दीवाने। आभासी रिश्तों के कायल,कविताई के मस्ताने।कर्म विमुख साधो सा जीवन,अरु व्याकरणी पैमाने। कुछ तो नभमंडल से तारे,कुछ मुझ जैसे घसि यारे।काम छोड़ कविताई करते,दुखी भये सब घर वारे। मैं भी शीश पटल सत संगी,तुम भी हो
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सुख-दुख की बाते बेमानी सुख-दुख( १६,१६)मैने तो हर पीड़ा झेली।सुख-दुख की बाते बेमानी। दुख ही मेरा सच्चा साथी,श्वाँस श्वाँस मे रहे सँगाती।मै तो केवल दुख ही जानूँ,प्रीत रीत मैने कब जानी,सुख-दुख की बाते बेमानी। सुख तो केवल छलना है,मुझे निरंतर पथ चलना है।बाधाओं से कब रुक पाया,जब जब मैने मन में ठानी,सुख-दुख की बातें बेमानी।
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पनघट मरते प्यास {सरसी छंद 16+11=27 मात्रा,चरणांत गाल, 2 1}.नीर धीर दोनोे मिलते थे,सखी-कान्ह परिहास।था समय वही,,अब कथा बने,रीत गये उल्लास।तन मन आशा चुहल वार्ता,वे सब दौर उदास।मन की प्यास शमन करते वे,पनघट मरते प्यास।। वे नारी वार्ता स्थल थे,रमणी अरु गोपाल।पथिकों का श्रम हरने वाले,प्रेमी बतरस ग्वाल।पंछी जल की बूंद आस के,थोथे हुए दिलास।मन
मां शारदे नमन लिखा दे नमन् लिखा दे. १६,१४वीणा पाणी, ज्ञान प्रदायिनी,ब्रह्म तनया माँ शारदे।सतपथ जन प्रिय सत्साहित,हितकलम मेरी माँ तार दे। मात शारदे नमन् लिखादे,धरती, फिर नभ मानों को।जीवनदाता प्राण विधाता,मात पिता भगवानों को। मात शारदे नमन लिखा दे,सैनिक और किसानों को।तेरे वरद पुत्र,माँ शारद,गुरु, कविजन, विद्वानों को। मात शारदे नमन लिखा दे,भू पर
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अटल बिहारी वाजपेई के लिए कविता हरिगीतिका छंद. (मापनी मुक्त १६,१२). अटल – सपूत श्री अटल भारत भू मनुज,हीशान सत अरमान है।जन जन हृदय सम्राट बन कवि,ध्रुव बने असमान है।नहीं भूल इनको पाएगा,देश का अभिमान है।नव जन्म भारत वतन धारण,या हुआ अवसान है।.हर भारत का भरत नयन भर,अटल की कविता गात है।हार न मानूं रार
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सखी के लिए कविता – डॉ0 दिलीप गुप्ता रिमझिम बरसे.मन है हरसेप्रणय को ब्याकुल हिरदय होवे,सात समंदर पार है सजनीबिरह में बदरा-मेघा रोवे…..तप्त हृदय की अगन बुझाने—–आओ न सखी.. आओ न सखी।।–।।00नीला अम्बर,हरी-भरी धरतीनाचत मोर रिझावत सजनी,उपवन डार-पात लदे फूलनमहकी रातरानी यहां रजनी,सुने आंगन को महकाने—-आओ न सखी…आओ न सखी।।–।।00धरती भीगी मन मोरा लथपथप्रेम का
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प्रकृति है जीवन का उपहार प्रकृति है जीवन का उपहार,इसे हम कब संभालेंगे।धरा की पावन आसन पर , इसे हम कब पौढ़ायेंगे।बचा ले अपने जीवन में , स्वास के दाताओं को अब , नहीं तो श्वास और उच्छवास को हम भूल जाएंगे।बेखट कट रहे हैं पेड़, हमारी ही इच्छाओं से , उजड़े बाग उपवन वन
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