मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं

मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं
(Nothing Lasts but the Joke)

किसी को
“परे”,
“अटल”,
“सदैव”
का दर्जा मत दो।

यहाँ
कुछ भी
अविनाशी नहीं।

दिखाओ मुझे—
जो आज जैसा है
वैसा ही
कल भी रहे।

दिखाओ मुझे—
जो तुम्हारी उम्मीदों से
कभी विश्वासघात न करे।

बुद्धिमान जानता है—
स्थितियाँ खेल हैं।
आज यह,
कल कुछ और।

वे किसी की नहीं होतीं।
न वफ़ादार,
न प्रतिबद्ध।
क्षणिक—
जुगनू की रोशनी जैसी।

ध्यान से देखो—
जो दिखता है
वह अस्थिरता है।

स्थिरता
एक मृगतृष्णा है,
जिस पर हम
भरोसा कर लेते हैं।

परिपक्व मन
अस्थायी को
बहुत बड़ा नहीं बनाता।
उसे
स्थायी का मुखौटा
पहनने नहीं देता।

वस्तुएँ—
वस्तुएँ ही हैं।
विचार—
विचार ही।
लोग—
लोग ही।

सब
लगातार बदलते हुए।

वे तुम्हारी
सुरक्षा की भूख
नहीं मिटा सकते—
जैसे
पर्दे पर चलती खाने की तस्वीरें
भूख नहीं मिटातीं।

हम चाहते हैं
कि चीज़ें
जमी रहें,
ताकि हम
सुरक्षित महसूस करें।

इसलिए
हम अस्थिर सत्य को
देखना टाल देते हैं,
और चीज़ों को
समय में जड़ मान लेते हैं।

क्या यह
आत्म-छल नहीं?

चीज़ों से यह उम्मीद करना
कि वे
तुम्हारी कल्पना जैसी हों—
दुःख को
निमंत्रण देना है।

इसलिए
हल्के मन से जियो।
दुनिया को
थोड़े हास्यपूर्ण तिरस्कार से देखो—
और हाँ,
खुद को भी।

आख़िरकार
यह सब
एक मज़ाक ही तो है—
और
मज़ाक के सिवा
यहाँ
कुछ भी
स्थायी नहीं।
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