प्रेमहीन काम, आनंदहीन जीवन
अगर काम
प्रेम योग्य नहीं है,
तो जीवन
जीने योग्य
कैसे होगा?
काम
दिन की एक फ़ाइल नहीं,
वह
तुम्हारी पहचान की धुरी है—
दिन उसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं,
सोच उसी से आकार लेती है,
रिश्ते
उसी की छाया में साँस लेते हैं।
काम को छोटा समझना
अपने अस्तित्व के
केंद्र को नकारना है।
जहाँ तुम खड़े हो
और जो तुम करते हो—
उनके बीच
फाँक मत बनने दो।
क्योंकि
हर समझौता
तनख़्वाह नहीं,
आत्म-विश्वास की
चुप्पी हुई हत्या है।
मत कहो—
“मैं तो बस पैसे के लिए काम करता हूँ,
असल ज़िंदगी
ऑफ़िस के बाद शुरू होती है।”
ऐसी कोई
दो ज़िंदगियाँ नहीं होतीं।
चेतना
अखंड होती है।
काम पर बिताया गया
हर घंटा
या तो
तुम्हारे सत्य का सम्मान करता है,
या
उसे
धीरे-धीरे
घिस देता है।
क्या तुम
घर में करुणामय हो सकते हो,
और
काम में निर्दय?
क्या ईमानदारी
सिर्फ़ रविवार के लिए होती है?
इस विरोधाभास को
तुम्हें
चैन से नहीं सोने देना चाहिए—
जब तक
यह सुलझ न जाए।
जो हो
वही करो।
जो करो
वही बनो।
तुम्हारे होने
और तुम्हारे करने
के बीच
कोई मुखौटा न रहे।
क्योंकि
जिस काम से प्रेम नहीं,
उस जीवन से भी
प्रेम करना
असंभव हो जाता है।





