खोल से बाहर

खोल से बाहर

आकाश से प्रेम
कोई भावना नहीं है।
वह एक असहजता है—
उस हर सीमा के प्रति
जिसे तुमने कभी
घर मान लिया था।

हर जीवन
किसी न किसी खोल में
शुरू होता है।
खोल सुरक्षा देता है,
ऊष्मा देता है,
पहचान देता है।
शुरुआत में
वह आवश्यक होता है।

पर जो आवश्यक था,
वही
स्थायी नहीं हो सकता।

एक बिंदु आता है
जब वही खोल
जिसने बचाया था,
दम घोंटने लगता है।
तब प्रश्न यह नहीं होता
कि खोल अच्छा है या बुरा—
प्रश्न केवल इतना होता है:
क्या मैं अब भी
इतना ही छोटा हूँ?

खोल
बाहर से नहीं टूटता।
कोई बाहर से आकर
तुम्हें मुक्त नहीं करता।
खोल
भीतर से दरकता है—
जब भीतर का जीवन
अपने विस्तार को
टालने से इंकार कर देता है।

पर मनुष्य का संघर्ष
चूज़े से अधिक जटिल है।
चूज़े का
एक ही खोल होता है।
तुम्हारे
अनेक हैं।

एक पहचान टूटती है—
दूसरी तैयार मिलती है।
एक सुविधा छूटती है—
दूसरी आकर्षक लगने लगती है।
हर खोल
एक विश्वास है,
हर विश्वास
एक सीमा,
और हर सीमा
एक ऐसा समझौता
जिसे तुमने
शांति का नाम दे दिया है।

तुम खोल से लड़ते हो,
उसे दोष देते हो,
उसे कोसते हो—
और फिर
उसी में
थोड़ा और सजा लेते हो।

पर खोल
घृणा से नहीं टूटता।

वह टूटता है
विकास से।

जब भीतर
स्पष्टता बढ़ती है,
जब आकांक्षा
आराम से बड़ी हो जाती है,
जब सत्य
सुरक्षा से अधिक
महत्त्वपूर्ण लगने लगता है—
तब खोल
असह्य हो जाता है।

ध्यान दो—
खोल नहीं बदलता,
तुम बदलते हो।
और वही परिवर्तन
खोल के लिए
असहनीय बन जाता है।

यदि तुम
छोटे बने रहना चाहते हो,
तो खोल
पूरी ज़िंदगी
सुरक्षित रहेगा।
और आकाश
सिर्फ़
एक सुंदर विचार।

पर यदि
आकाश से
सच में प्रेम है,
तो
खोल को
घर नहीं कह पाओगे।
उसे
सजाने की इच्छा
खत्म हो जाएगी।

तुम
उसे
तोड़ोगे—
न क्रोध से,
न हड़बड़ी से,
बल्कि
इस सरल तथ्य से
कि तुम
उसमें
अब समा नहीं सकते।

मुक्ति
भागना नहीं है।
मुक्ति
बड़ा होना है।

और जो
वास्तव में बड़ा हो जाता है,
उसके लिए
कोई भी खोल
अंततः
टूट ही जाता है।

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