कविता बहार

माता के नवराते पर कुंडलियाँ

हिंदी कविता

नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है। नवरात्रि शब्द एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। माता पर कविता बहार की छोटी सी सुन्दर कुंडलियाँ […]

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जीत पर कविता

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जीत पर कविता काल चाल कितनी भी खेले,आखिर होगी जीत मनुज कीइतिहास लिखित पन्ने पलटो,हार हुई है सदा दनुज की।। विश्व पटल पर काल चक्र ने,वक्र तेग जब भी दिखलाया।प्रति उत्तर में तब तब मानव,और निखर नव उर्जा लाया।बहुत डराये सदा यामिनी,हुई रोशनी अरुणानुज की।काल चाल कितनी भी खेले,आखिर,………………….।। त्रेता में तम बहुत बढा जब,राक्षस

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महामारी पर कविता

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महामारी पर कविता कोरोना से जन जीवन हताश है।खिले चेहरे आज क्यों उदास हैं।मन में भरो हमारे माता विश्वास है।विपदा की घड़ी में इंसान क्यों निराश है।माँ दुर्गा भवानी विपदा से हमको संभालो।कैसी है ये मुश्किल इससे हमको निकालो।कर जोड़ विनती है माँ दुर्गा भवानी।इस महामारी से दुनिया को बचा लो। *सुन्दर लाल डडसेना”मधुर”*ग्राम-बाराडोली(बालसमुंद),पो.-पाटसेन्द्री

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क्रांति का सागर पर लेख

हिंदी कविता

क्रांति का सागर पर लेख 1947, में फिर से तिरंगा लहराया था, हमने फिरंगियों को भारत से मार भगाया था। क्रांति वो सागर जो हर व्यक्ति में बह रहा था। ये उस समय की बात है, जब बच्चा बच्चा आजादी आजादी कह रहा था। मै शीश जूकाता हूं, उनके लिए जिन्होंने शीश कटवाया था, भारत

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मित्रों तोड़ो मौन पर कविता

हिंदी कविता

मित्रों तोड़ो मौन पर कविता जब-जब निर्वात-मौनसम्प्रेषणहीन होकरपड़ा होता है लाचारतब-तबवाणी का स्वरमाध्यम बनकरजोड़ता हैदिलों के दो पुलों को जब-जब बर्फ़ीला-मौनजम जाता हैमाइनस डिग्री परतब-तबबर्फ़-सी जमी मौन के कणों कोअपनी ऊष्मा सेपिघलाती हैध्वनि-मिश्रित साँसों की गर्मी जब-जब अपाहिज-मौनरुक जाता है-ठहर जाता हैचलने में होता है असमर्थतब-तबशब्दों की बैशाखीथामकर मौन की ऊँगलीपग-पग आगेबढ़ाता है ज़बान तक मित्रों !

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थूकना और चाटना पर कविता

हिंदी कविता

थूकना और चाटना पर कविता उसके मुँह के सारे थूंकअब सूख चुके हैं ढूंढ-ढूंढकर वहपहले थूंके हुए जगहों पर जाकरउन थूंको को चाटकरफिर से गीला कर रहा है अपना मुँह उन्हें अपने किए ग़लतीका एहसास हो चुका है अब बेहद पछतावा है उसेकि आखिर बात-बात परक्यूं थूंका करता था ? आख़िर उसे ही अबअपना ही

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कितना कुछ बदल गया इन दिनों…

समाज और यथार्थ

कितना कुछ बदल गया इन दिनों… देशभक्ति कभी इतनी आसान न थीसीमा पर लड़ने की जरूरत नहींघर की चार दीवारी सीमा मेंबाहर जाने से ख़ुद को रोके रहना देशभक्ति हो गई ऑफिस जाने की जरूरत नहींबिना काम घर में बैठे रहना हीआपकी कर्तव्यनिष्ठा,त्याग और समर्पण का प्रमाण हो गया मलूकदास जीबड़े ही मर्मज्ञ और दूरदर्शी संत

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हाइकु

हाइकु तृतीय शतक

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हाइकु शतक १बुलकड़ियाँरिक्त गौशाला द्वारसूखा गोबर।२चैत्र प्रभातविधवा का शृंगारदूर्वा टोकरी।३फाग पूर्णिमाडंडे पर जौ बालीबालक दौड़ा।४होली दहनचूल्हे पे हंसती माँगेहूँ बालियाँ।५मदिरालयकुतिया को पकोड़ेनाली में वृद्ध।६औषधालयचारपाई पे वृद्धनीम निम्बोली।७कैर साँगरीबाजरी की रोटियाँहाथ खरोंच।८चंग का स्वरमातृ गोद बालिकाआँख में आंसू।९निम्बू का रसरंगे हाथ बालिकामेंहदी तीली।१०भंग की गोलीसिल बट्टे पे पिस्ताबादाम गिरी।११अजवायनअरबी की पत्तियाँबेसन लेप।१२प्याज की क्यारीकिसान की बेटियाँछाछ

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जिंदाबाद पर कविता

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

जिंदाबाद पर कविता लाईलाज घातकवायरस के आगमन परदेवालय, खुदालय व गोडालयया अन्य धर्मस्थलसब बंद हैंआरती, अजान व प्रार्थनाअनिश्चित काल के लिएटाल दीं गईं हैंअनुष्ठान निलंबित हैंटोने-टोटकेजादू-मंत्रसब निष्प्रभावी हैंखुले हैंऔषधालय, दवालय व जांचालयचिकित्सक जिंदाबादबहुउद्देशीय स्वास्थ्य-कर्मी जिंदाबादविज्ञान जिंदाबादमास्क बनाने वालेजिंदाबादमास्क बांटने वालेजिंदाबाद -विनोद सिल्ला©

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वक्त पर कविता

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वक्त पर कविता दुनिया कितनी सुंदर व प्यारी है।भारत उन सबमें नूतन न्यारी है।दुनिया के इस समय की घटना सुनाते हैं।चलो आज घर में वक्त बिताते हैं।1.सभी तरफ कोहराम मचा है।जान बचाना हो गया भारी।मनुष्य चाँद पर जा पहुंचा।पर एक वायरस से कैसी लाचारी।इस विपदा की घड़ी में अपना कर्तव्य निभाते हैं।चलो आज घर में

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जल पर कविता

हिंदी कविता

जल पर कविता जल जीवन का सार है।जल जीने का आधार है।जल प्यासे की पुकार है।जल जीवन का करतार है।जल है तो कल है।जल बिना जीवन विकल है।बूँद बूँद का संचय कर मधुर।तब ही होगा तेरा जीवन सफल है।जल ही जीवन है।इसे व्यर्थ में न बहाएँ।जल संचय कर मधुर।अपना कर्तव्य निभाएँ।जल जीवन की पहचान है।जल

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घर-बेघर पर कविता

हिंदी कविता

घर-बेघर पर कविता सरकार का आदेश हैआज मुझेऔर बाकी सब को भीघर पर रहना हैमैं और बाकी सबहर संभव प्रयास करकेघर पर ही रहेंगेलेकिन सरकारयह बताना भूल गईकहाँ रहेंगेनगरों-महानगरों के बेघरजिनका धरती बिछौनाआसमान ओढ़ना हैजो करते हैं विचरणसरकारों केमुख्यालयों की नाक के नीचेकहाँ रहेंगे वे खानाबदोशजो स्वयं केव पशुओं केभोजन की तलाश मेंघूमते हैंएक गांव

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