कविता बहार

इंतज़ार आँखे में

हिंदी कविता

इंतज़ार आँखे में इंतज़ार करती है आँखेहर उस शक्श की, जिसकी जेब भरी हो,किस्मत मरी हो, लूट सके जिसे,छल सके जिसे, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर उस बीमार की, जो जूझ रहा है मर्ज में,औंधे पड़ा है फर्श में, कर सके जिससे अपनी जेब गर्म,लूट सके इलाज के बहाने, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर […]

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सांध्य है निश्चल -बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’

नारी जीवन और संवेदना

सांध्य है निश्चल रवि को छिपता देख, शाम ने ली अँगड़ाई।रक्ताम्बर को धार, गगन में सजधज आई।।नृत्य करे उन्मुक्त, तपन को देत विदाई।गा कर स्वागत गीत, करे रजनी अगुवाई।। सांध्य-जलद हो लाल, नृत्य की ताल मिलाए।उमड़-घुमड़ कर मेघ, छटा में चाँद खिलाए।।पक्षी दे संगीत, मधुर गीतों को गा कर।मोहक भरे उड़ान, पंख पूरे फैला कर।।

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सेवा का संरक्षण- दिलीप कुमार पाठक “सरस”

हिंदी कविता

है झुकी डाल फल फूल फली,मुस्कानें लख-लख लहरातीं | था एक बीज जो वृक्ष बना, बरसातें उसको नहलातीं|| माटी पाकर आया बचपन,सेवा का संरक्षण पाया| लकड़ी पत्ती फल फूल कली, है सेवा की सिर पर छाया|| गुरु मातु पिता का संरक्षण, हम सबने ही कल पाया था| जिनके अपने श्रम के बल पर, कल अंकुर बन मुस्काया था|| कुछ

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निषादराज के दोहे

हिंदी कविता

*निषादराज के दोहे (1) संसारकितना प्यारा देख लो,ये अपना संसार।स्वर्ग बराबर हैं लगे,गाँव-शहर वनद्वार।। (2) समयसमय बड़ा अनमोल है,कीमत समझो यार।समय बीत जब जायगा,फँसो नहीं मझधार।। (3) गतिअपनी गति में काम को,करना अच्छा यार।तभी सफलता हैं मिले,उन्नति  घर संसार।। (4) जीवनजीवन की इस राह पर,चलना कदम सम्हाल।आगे   पीछे   देखना, रहे  न  कोई   काल।। (5) मनमन

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village based Poem

मेरे गांव का बरगद – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

मेरे गांव का बरगद  मेरे गाँव का बरगदआज भी वैसे ही खड़ा हैजैसे बचपन में देखा करता थाजब से मैंने होश संभाला हैअविचलवैसे ही पाया है हम बचपन में उनकी लटों से झूला करते थेउनकी मोटी-मोटी शाखाओंके इर्द-गिर्द छुप जाया करते थेधूप हो या बारिशउसके नीचेघर-सानिश्चिंत होते थे  तब हम लड़खड़ाते थेअब खड़े हो गएतब हम बच्चे थेअब बड़े हो गएतब हम तुतलाते

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जीवन रुपी रेलगाड़ी – सावित्री मिश्रा

हिंदी कविता

जीवन रुपी रेलगाड़ी कभी लगता है जीवन एक खेल है,कभी लगता है जीवन एक जेल है।पर  मुझे लगता है कि ये जीवनदो पटरियों पर दौड़ती रेल है।भगवान ने जीवन रुपी रेल काजितनी साँसों का टिकट दिया है,उससे आगे किसी ने सफर नहीं कियासुख और दुख जीवन की दो पटरियाँ,शरीर के अंग जीवन रुपी रेल के

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तुम्हारे होने का अहसास

हिंदी कविता

तुम्हारे होने का अहसास तुम आसपास नहीं होतेमगर आसपास होते हैंतम्हारे होने का अहसासमन -मस्तिष्क में संचिततुम्हारी आवाजतुम्हारी छविअक़्सरहूबहूवैसी-हीबाहर सुनाई देती हैदिखाई देती हैतत्क्षणतुम्हारे होने के अहसास से भर जाता हूँधड़क जाता हूँकई बार खिड़की के पर्दे हटाकरबाहर देखने लग जाता हूँयह सच है कि तुम नहीं होतेपरपलभर के लिएतुम्हारे होने जैसा लग जाता हैलोगों ने बतायायह अमूमन सब के

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हाइकु

सुकमोती चौहान के हाइकु

हिंदी कविता

सुकमोती चौहान के हाइकु पितर पाख~पति की तस्वीर मेंफूलों की माला। पूस की रात~भुट्टे भून रही हैअलाव में माँ। श्मशान घाट~कुत्ते के भौंकने सेसहमा रामू। श्रृंगार पेटी~गौरैया नोंचे देखशीशा में छवि। गौरैया झुँड़चुग रहे हैं दाने~धूप सुगंध। पीपल पातखा रही बकरियाँ~वृक ताक में। गौ टीले पर~शेरनी के मुँह मेंबछड़ा ग्रीवा। मयूर नृत्य~मोबाइल देखतेबच्चों की टोली।

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बेटी की पुकार

नारी जीवन और संवेदना

      बेटी की पुकार पिता का मैं ख्याल रखूंगीतेरे कहे अनुसार मैं चलूंगीरूखी सूखी ही मैं खा लूंगीमत मार मुझे सुन मेरी मांमुझे धरा पर आने तो दे।।बोझ मैं तुमपर नहीं बनूंगीपढ़ लिख कर बड़ा बनूंगीतेरा मैं नाम रोशन करुंगीमत मार मुझे सुन मेरी मांमुझे  धरा पर आने तो दे।।खिलती हुई नन्ही कली

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संकल्प कविता

हिंदी कविता

संकल्प मेरी अंजुरी में भरे,जुगनू से चमकते,कुछ अक्षर हैं!जो अकुलाते हैं,छटपटाते हैं!सकुचाते हुए कहते हैं-एकाग्र चित्त होकर,अब ध्यान धरो!भीतर की शांति सेकोलाहल कम करो!अंतर के तम को मिटाकर,दिव्य प्रकाश भरो!झंझोड़ कर जगाओ,सोयी हुई मानवता को,भटकते राहगीरों कोसही दिशा दिखाओ!बुद्धत्व का बोध करोकुछ करो,कुछ तो करो!शब्दों की चुभन से,सचेत,सजग हुई मैं,फिर लिया संकल्प!कुछ करना होगा! कुछ

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हिन्दी हमारी शान – भुवन बिष्ट

हिंदी कविता

हिन्दी हमारी शान हिन्दी न केवल बोली भाषा,                         ये हमारी शान है।मातृभाषा  है  हमारी,                           ये बड़ी महान है।।…….. चमकते तारे आसमां के ,                       

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मुझे अभी नहीं सोना है

मन और भावनाएँ

मुझे अभी नहीं सोना है मुझे अभी नहीं सोना है। जब तक थक कर चूर न हो जाऊँ, भावनाओं का बोझ ढोना है। मुझे अभी नहीं सोना है। ख्वाब जब तक न हों पूरे, मैंने ही बंदिशें लगायीं खुद पेख्वाब देखने पर।। घटाटोप अँधेरा परये झींगुर के शोरकहते हैं कुछ तो । शायद बुझाने को कहतेआँखों के दीये। पर इन कूप्पियों में

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