जलती धरती/शिव शंकर पाण्डेय
जलती धरती/शिव शंकर पाण्डेय न आग के अंगार से न सूरज के ताप से।।धरा जल रही है, पाखंडियों के पाप से।।सृष्टि वृष्टि जल जीवन सूरज।नार नदी वन पर्वत सूरज।।सूरज आशा सूरज श्वांसा।सूर्य बिना सब खत्म तमाशा।सूर्य रश्मि से सिंचित भू हम जला रहे हैं खुद आपसे।धरा जल रही है पाखंडियों के पाप से।।सूरज ही मेरी … Read more