मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

काँटों पर चलना सीखे – मनीभाई नवरतन

हिंदी कविता

अब काँटों पर चलना सीखें अब तक सुमनों पर चलते थे, अब काँटों पर चलना सीखें॥खड़ा हुआ है अटल हिमालय, दृढ़ता का नित पाठ पढ़ाता।। बहो निरन्तर ध्येय-सिन्धु तक, सरिता का जल-कण बतलाता।अपने दृढ़ निश्चय से पथ की, बाधाओं को ढहना सीखें। अब…… हममें चपला-सी चंचलता, हममें मेघों की गर्जन।हममें पूर्ण चन्द्रमा-चुम्बी, सिन्धु-तरंगों का नर्तन […]

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प्रायश्चित- मनीभाई नवरत्न

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प्रायश्चित- मनीभाई नवरत्न हम करते जाते हैं कामवही जो करते आये हैंया फिर वो ,जो अब हमारे शरीर के लिएहै जरूरी। इस दरमियानकभी जो चोट लगेया हो जाये गलतियां।तो पछतावा होता है मन मेंजागता है प्रायश्चित भाव। वैसे सब चाहते हैंगलतियां ना दोहराएं जाएं।सब पक्ष में हैंसामाजिक विकास अग्रसर हो।गम के बादल तले,सुखों का सफर

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हाय यह क्या हो गया?- मनीभाई नवरत्न

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हाय यह क्या हो गया? हाय यह क्या हो गया?महाभारत हो गया ।हुआ कैसे?एकमात्र दुर्योधन से!किसका बेटा ?अंधे धृतराष्ट्र का!पट्टी लगाई आंखों मेंपतिव्रता गांधारी का।शायद कम गई दृष्टि इनकी,उद्दंडता जो दुर्योधन ने की । असल कसूरवार कौन?जिसने दुर्योधन को गढ़ा।जीवन के महत्वपूर्ण घड़ियों में ,जो सारे बुरे सबक को पढ़ा ।दोषी वे सारे व्यवस्था हैं

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ये तो बस मूर्खों की पीढ़ी बनायेगा

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ये तो बस मूर्खों की पीढ़ी बनायेगा ये जानता नहीं अपनी मंजिल,  लक्ष्य के लिए कैसे सीढ़ी बनायेगा ?मूर्ख बनाने में शातिर महाप्रभु, ये तो बस मूर्खों की पीढ़ी बनायेगा ।। इसे स्वयं को जो भी अच्छा लगे, उसे सत्य मान लेता है।स्वयं को सच्चा परम ज्ञानी, दूसरों को झूठा जान लेता है।सच झूठ का

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बेखुदी की जिंदगी- मनीभाई नवरत्न

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बेखुदी की जिंदगी… बेखुदी की जिंदगी हम जिया करते हैं। शायद इसलिए हम पिया करते हैं । रही सही उम्मीदें तुझ पर अब जाती रही।ना समझ बन गए हैं कोई सोच आती नहीं ।मिली तुझसे जख्मों को हम सीया करते हैं । बेखुदी की जिंदगी… बेशुमार दौलत क्या? हमको पता नहीं ।बेपनाह मोहब्बत क्या ?तुमको

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मुझे तेरी हर बातें याद आते हैं- मनीभाई नवरत्न

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मुझे तेरी हर बातें याद आते हैं मुझे तेरी हर बातें याद आते हैं।तुमसे हुए हर मुलाकातें सताते हैं ।क्यों उस दिन अनजान रहा ,तेरे चाहत का ना भान रहा ।अब जब पता है तू ही लापता है , कैसे मिलू तुझे?सोचकर हम घबराते हैं।मुझे तेरी हर बातें …. बीते कल में चेहरा तेरा खोजू,आजकल

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हे दीन दयालु हे दीनानाथ- मनीभाई नवरत्न

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हे दीन दयालु हे दीनानाथहे दीन दयालु, हे दीनानाथ !दीन की रक्षा करलें मांगे वरदान। हे कृपालु ,हे भोलेनाथ! हे कृपालु , हे भोलेनाथ!हीन की रक्षा कर ले मांगे वरदान । ऊंची चोटी पर तेरा वास है ।हर तरफ शांति, उल्लास है। छायी रहे ऐसे सदा, अमन से ये जहान। मांगे वरदान। हे दीन दयालु….

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मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है- मनीभाई नवरत्न

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मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है- मनीभाई नवरत्न मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है ।जैसे तेरी पहचान वैसे मेरी पहचान है। जो तू सोचता है वह मेरी सोच है ।जो तू खोजता है वह मेरी खोज है।इस बात पर भला क्यों अनजान है ? मैं इंसान हूं….जब मैं राहों से गुजरता हूं तु

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तुम तो लूटोगे ही प्यारे,लुटेरों की बस्ती में

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तुम तो लूटोगे ही प्यारे,लुटेरों की बस्ती में पुकार रहे हो किससे बंदेखुद ही हो रहबर अपना।छिप रहे हो कहां कहां पे कहीं नहीं है घर अपना ।। आबरू की फिक्र है तुझे जाएगी कभी जो सस्ती में ।।तुम तो लूटोगे ही प्यारे ,हुस्न पाई लुटेरों की बस्ती में।। तेरी जिद करने को हासिल इस

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मनीभाई के पिरामिड रचना

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मनीभाई के पिरामिड रचना ★कलम,कागज,कलमकार★मैंएकअबूझतुकबंदीकलमकारहोता ज्यों व्यथितदेता उसे आकारहै मेरे सहचरकलम कागजमुखर नहींमुझ जैसानिशब्ददोनोंही। मनीभाई”नवरत्न” मनीभाई के पिरामिड रचना ★मरणासन्न★ येमेरीकौन सीहै अवस्थाजहाँ से अबदिखता है सचहोने लगा पवित्रकैसी भुलभुलैयाअब चला पतामरणासन्नहकीकतजिन्दगीदिखादी। “मनीभाई”नवरत्न” मनीभाई के पिरामिड रचना ★रिश्ते नातों का जाल★ ये जगअजीबजहाँ परहोती सबकीअलग जिन्दगीतथापि समाहितरिश्ते नातों का जालखट्टी मीठी यादेंआगे बढ़ातीकहानी कोहरेकसिरेमें।“मनीभाई” नवरत्न,मनीभाई

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मन की आंखें

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मन की आंखें पात्र परिचय :-रागिनी –  एक कामकाजी लड़की।राजन-    अंधा व्यक्ति ।राहुल –   रागिनी की सहकर्मी । (रागिनी अपनी ऑफिस की ओर जा रही थी। रास्ते में एक अंधा आदमी सड़क किनारे खड़ा हुआ सड़क पार करने की कोशिश रहा था ।) रागिनी : (ऑटो से ही)भैया !अभी मुझे अपने ऑफिस तक नहीं जानी

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आ सनम आ मेरे दिल में तू आ

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आ सनम आ मेरे दिल में तू आ आ सनम आ ,मेरे दिल में तू आ।आ सनम आ मेरे दिल को चुराके जा । जाने जा मैंने तुम्हें प्यार किया ।रात दिन तुझे याद किया ।अब तो मुझसे रूठ के ना जा जा ।। फूलों से खुशबू आ रही ।भंवरे झुमके यह गा रही ।मैंने

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