मैं तृप्त हूँ या नहीं—किसे परवाह है!
हिंदी कवितामैं तृप्त हूँ या नहीं—किसे परवाह है! अशांति है—अशांति है—अशांति है। फिरएक दिनसाहस करकेमैंनेअशांति को देखा। वहाँकुछ महान नहीं था।बसछोटी-छोटी माँगें,नाज़ुक इच्छाएँ,अहम् कीथकी हुई पुकार। और उसी क्षणअशांति कीसेवा करने कीज़रूरत खत्म हो गई। जबखुद की बेचैनीकेंद्र नहीं रहती,तोकुछ बड़ाजगह लेने लगता है। कोई कारण,कोई काम,कोई सत्य—जोइतना ध्यान माँगता हैकिअपने बारे मेंसोचने काअवकाश ही नहीं
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