मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

देह मुक्ति पर वीटो लगाएगी

हिंदी कविता

देह मुक्ति पर वीटो लगाएगी जैसा हैवैसा मत छोड़ दो।धारा के साथ मत बहो। समयतुम्हें नहीं बदलेगा।अनुभवतुम्हें नहीं जगाएगा। चालीस हज़ार साल भीजी लो—तो भीकुछ अपने आपनहीं बदलेगा। हमसुख के इच्छुक हैं,परिश्रम से बचने वाले। किसी को काम कराना होतोइनाम देना पड़ता है।काम न कराना होतोकुछ मत करो। जड़ताहमारीस्वाभाविक सुविधा है। मुक्तिसबसे ऊँची उपलब्धि है—औरसबसे

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आनंद — सबसे कठिन सुख

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आनंद — सबसे कठिन सुख(Joy: The Hardest Pleasure) आनंदसाधारण सुख नहीं है।वह ऊपर उठाता है—और इसलिएकठिन है। सस्ते सुखआसानी से मिल जाते हैं।खुद को बेचो,नशे में डूबो,भूल जाओ—कुछ ही पल में। ये सुखतुम्हें नहीं उठाते,तुम्हें घटाते हैं। पर बिना सुखजीवन भी नहीं चलता।तो चुनाव करो—नीचे गिरने का,या ऊपर उठने का। ऊँचा सुखमाँगता है—संयम,सजगता,बुद्धि,और समर्पण। इसीलिएअधिकांश

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पहले से ही घर

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पहले से ही घर कुछ लोगकिसी मंज़िल के लिएचलते हैं। और कुछमंज़िल से हीचलना शुरू करते हैं। दूसरेपहुँचें या न पहुँचें—वेपहले सेघर में होते हैं। जो मानते हैंकि दुनिया मेंकुछ हासिल करने लायकअंतिम चीज़ है,वेआशा मेंभटकते हैं। और कुछखिलाड़ी की तरहपूरी ताक़त से खेलते हैं—यह जानते हुएकि यहएक खेल है। वेडर से नहीं,असुरक्षा से नहीं—स्वतंत्रता

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तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं

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तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं मन में उठने वालीकोई भी लहरअकेली नहीं उठती।मन दुनिया से बना है,और दुनियामन से। आतंकी का लक्ष्य—मारना। एक का लक्ष्य—मंदिर।दूसरे का—मस्जिद। मक्खी का लक्ष्य—गंदगी। हार्मोन से चलती देह का लक्ष्य—भोग। लालची मन का लक्ष्य—पैसा। ऊबे हुए मन का लक्ष्य—मनोरंजन। निर्भर मन का लक्ष्य—स्वीकृति। असुरक्षित मन का लक्ष्य—सहारा। तो मनआख़िर पीछा किसका

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लत का अंतिम इलाज

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लत का अंतिम इलाज लतकोई बीमारी नहीं,एक खाली जगह हैजो शोर मचाती है। तुम लौटते हो—बार-बार—क्योंकिवहाँ कुछ मिलता है।झूठा सही,पर मिलता तो है। अगर कुछ न मिलता,तो तुम जाते ही क्यों? टीवी दोषी नहीं।मोबाइल दोषी नहीं।पोर्न, पैसा, नशा—कुछ भी दोषी नहीं। दोषतुम्हारी ज़रूरत है। एक भीतर कारोता हुआ गड्ढा,जो कहता है—“कुछ दो…कुछ भी दो।” तुम

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सुख से परे

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सुख से परे जीवन का उद्देश्यसुख नहीं है,सुख पाने कीबेचैनी से मुक्ति है। पैसा?सफलता?खुशी?इतने छोटे लक्ष्यइतने विशाल जीवन के लिए—कितनी अजीब सौदेबाज़ी। जिस सुख कोतुम जानते हो,वह सिखाया गया है,पालित है,क्षणिक उत्तेजना कानाम बदल दिया गया है। और वहदुख के बिनाजी ही नहीं सकता। सुख चाहिएतो पहले दुख चाहिए—गहरा सुख चाहिएतो गहरा दुख चाहिए।यही हैखुशी

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पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो

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पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो भूख पेट में नहीं,मन में रहती है।अंधी, बेचैन,कभी न भरने वाली—और उसी नेसब कुछ खा लिया। तुम गलत जीकरसही उपभोग कीआशा कैसे करते हो? धरती से रिश्तातुम्हारे जीवन जैसा है—टूटा हुआ,अचेत,लालची। सही जीवनकिसी नीति से नहीं,जागरूकता से शुरू होता है। जीवित होनासचेत होना है।और सचेत होनाखुद को जानना

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इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो

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इच्छा को मारो मत, शुद्ध करो इच्छा अपराध नहीं है।आकर्षण पतन नहीं है।गलती चाहने में नहीं,गलती उस दिशा में हैजहाँ तुम चाह रहे हो। इच्छा आग है—उसी आग सेदीपक जलता है,उसी से घर भी जलते हैं। समस्या यह नहींकि तुम दौड़ते हो,समस्या यह हैकि तुम किसके पीछे दौड़ते हो। तुम मृगमरीचिका सेप्यास बुझाना चाहते हो,छाया

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पूर्णता नहीं, निरंतरता

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पूर्णता नहीं, निरंतरता पूर्ण होना लक्ष्य नहीं,खड़ा रहना लक्ष्य है।गिरकर भीपीठ न दिखाना—यही जीवन है। लड़ाई शुरू करने से पहलेइतना जान लो—क्या मूल्यवान है,और किसके लिएतुम हार स्वीकार नहीं करोगे। सौ बार गिरो,सही दिशा में गिरो।कीमत चुकानी पड़े—तो चुकाओ।गहराई सस्ती नहीं होती। आसानी मत माँगो।तालियाँ मत चाहो।ईमानदारी का रास्ताआराम के लिए नहीं होता। जब वार

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एक अग्नि से अगली अग्नि तक

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एक अग्नि से अगली अग्नि तक सूची पूरी करने वाले लक्ष्यदेह को चाहिए—टिक लग सके,इनाम मिले,नाम चमके। पर चेतनाकुछ और खोजती है—इतना विशाल,इतना उज्ज्वल,कि जीवन भर दौड़ोफिर भीपूरा न हो। इसलिएवही चुनोजिससे प्रेम करनाटालना असंभव हो।या ऐसा काम चुनोजो इतना बड़ा होकि प्रेमअपने आपजन्म ले। पूछो खुद से—क्या हैजो मैं बिना दाम के भी कर

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स्वयं को पराजित करो

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स्वयं को पराजित करो सबसे बड़ा युद्धकिसी और से नहीं—अपने ही भीतर है। इच्छाएँ हैं,हितों पर खतरे हैं,जीवनलगातार चुनौती है—और हाँ,उसी में आनंद भी छिपा है। हम हारते हैंऔर चकित रह जाते हैं—मैं क्यों नहीं जीत पा रहा?क्यों हर बारखुद से हीपीछे रह जाता हूँ? ध्यान से देखो—हार बाहर से नहीं आती।वह भीतर जन्म लेती

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क्षमा के परे

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क्षमा के परे तुमरंजिश इसलिए रखते होक्योंकितुम चाहते होलोगतुम्हारी कल्पनाओं मेंफिट हों। वे नहीं होते।औरघावइच्छाओं को लगता है। तुम्हारी अपेक्षाएँदूसरों कोतुम परशक्ति दे देती हैं—औरतुम्हेंअसुरक्षित छोड़ जाती हैं। दूसरों कोअपनी अपेक्षाओं सेमुक्त कर दो। दूसरावह नहीं हैजोतुम सोचते हो—वहवही हैजो वह है। जबलोगतुम्हारी चाह केअनुसार नहीं चलते,तोदर्दसिर्फचाह को होता है। यह देख पानाकिअधिकांश लोगसंस्कारों कीमशीनें

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