समाज और यथार्थ

श्रीमती पदमा साहू की 10 कवितायेँ

समाज और यथार्थ

नारी का साहस जग में नारी का अवतार चार,माता , भार्या, पुत्री, बहना।सौम्य स्वभाव ,त्याग ,सेवा ,नारी का है अद्भुत गहना।नारी साहस, प्रेरणा की मूर्ति ,ममता ,वात्सल्य नारी का खजाना।नारी है गृहस्ती का पहिया,परिवार की आस्था और भावना।रणक्षेत्र में दुर्गा ,लक्ष्मी नारी ।समाज रक्षक शत्रु संहारणा ।प्राचीन नारी का गौरव देखो ,बनके उभरी सामाजिक संरचना।पशु […]

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हर तरफ है भ्रष्टाचार – आशीष कुमार

समाज और यथार्थ

प्रस्तुत गीत का शीर्षक “हर तरफ है भ्रष्टाचार है” जोकि आशीष कुमार (मोहनिया, कैमूर, बिहार) की रचना है. इसे वर्तमान समाज में फैले भ्रष्टाचार को आधार मानकर रचा गया है. इस रचना के माध्यम से बताया गया है कि हमारे समाज में भ्रष्टाचार कितनी गहरी पैठ बना चुका है.

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गजानन माधव मुक्तिबोध के लोकप्रिय कविता

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गजानन माधव मुक्तिबोध के लोकप्रिय कविता भूल ग़लती / गजानन माधव मुक्तिबोध भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकरतख्त पर दिल के,चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,खड़ी हैं सिर झुकाएसब कतारेंबेजुबां बेबस सलाम में, अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमेदरबारे आम में। सामनेबेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटाचेहराकि जिस पर

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सुमित्रानंदन पंत की १० सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ

समाज और यथार्थ

परिवर्तन / सुमित्रानंदन पंत (१)अहे निष्ठुर परिवर्तन!तुम्हारा ही तांडव नर्तनविश्व का करुण विवर्तन!तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,निखिल उत्थान, पतन!अहे वासुकि सहस्र फन!लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतरछोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर !शत-शत फेनोच्छ्वासित,स्फीत फुतकार भयंकरघुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर !मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर ,अखिल विश्व की विवरवक्र कुंडलदिग्मंडल ! (२)आज कहां वह पूर्ण-पुरातन,

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बाल भिक्षुक -आशीष कुमार

समाज और यथार्थ,

प्रस्तुत हिंदी कविता का शीर्षक “बाल भिक्षुक” है जोकि आशीष कुमार मोहनिया, कैमुर, बिहार की रचना है. इसे वर्तमान समाज में दीन हीन अनाथ बच्चों की दयनीय स्थिति को ध्यान में रखकर लिखा गया है जिनका जीवन बसर आज भी मंदिर की सीढ़ियों पर या फिर हाट बाजार में भीख मांग कर होता है.

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कन्या पूजन या भ्रूणहत्या -राकेश सक्सेना

समाज और यथार्थ

प्रस्तुत कविता का शीर्षक – “कन्या – पूजन या भ्रूण हत्या” समाज के उन लोगों से सवाल है जो एक तरफ तो देवी स्वरूपा कन्या का पूजन करते हैं वहीं अपने परिवार में बेटी होने का दुःख मनाते हैं। इसी विषय वस्तु को आधार मानकर रची गई है।

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वह स्त्री है( स्त्री आधारित कविता)

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इस कविता में स्त्री के विविध रूपों में उसकी विविध शक्तियों को दर्शाया गया है। जो यथार्थ जीवन से जुड़ी हुई हैं।

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अपने लिये जीना (अदम्य चाह)-शैली

समाज और यथार्थ

“अदम्य चाह”, शीर्षक की कविता, एक मध्यमवर्ग की भारतीय स्त्री की दिली हसरत है। बेटी जन्म से बंधनों में रहती है, परिवार, समाज के सैकड़ों पहरे और प्रश्न झेलती है, शादी के बाद तो पहरे और भी बढ़ जाते हैं। मेरा स्वयं का मन एक स्वच्छंद जीवन के लिए तरसता है, मुझे लगता है कि मैने स्त्री मात्र की हार्दिक इच्छा को शब्द दिये हैं.

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widow

विधवा पर कविता

समाज और यथार्थ

मैंने अपनी स्वरचित कविता “विधवाएं” कुछ समय पहले ही लिखी है ,और इसे लिखने के लिए प्रेरणा भी मुझे यथार्थ ही मिली। कि हम चाहे कितनी ही तरक्की क्यूं न कर ले मगर हमारी सोच औरतों को लेकर अब भी संकीर्ण ही है।

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