समाज और यथार्थ

कितना कुछ बदल गया इन दिनों…

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कितना कुछ बदल गया इन दिनों… देशभक्ति कभी इतनी आसान न थीसीमा पर लड़ने की जरूरत नहींघर की चार दीवारी सीमा मेंबाहर जाने से ख़ुद को रोके रहना देशभक्ति हो गई ऑफिस जाने की जरूरत नहींबिना काम घर में बैठे रहना हीआपकी कर्तव्यनिष्ठा,त्याग और समर्पण का प्रमाण हो गया मलूकदास जीबड़े ही मर्मज्ञ और दूरदर्शी संत […]

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निर्भया न्याय दिवस पर कविता

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निर्भया न्याय दिवस पर कविता सन् दो हजार बीस,बीस मार्च रहा अनुपम।स्वर्णिम दिन है आज,शांत मन तन है शुद्धम।हुई न्याय की जीत,निर्भया तेरी जय हो।दुराचार का अंत,सजा देना अब तय हो।सात साल के बाद में,फाँसी में झूले सभी।अब हो नहीं समाज में, फिर ऐसी घटना कभी। सुकमोती चौहान रुचिबिछिया ,महासमुन्द,छ.ग.

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विश्व कविता दिवस – सुन्दर लाल डडसेना

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विश्व कविता दिवस (अंग्रेजी: World Poetry Day) प्रतिवर्ष २१ मार्च[1] को मनाया जाता है। यूनेस्को ने इस दिन को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा वर्ष 1999[2] में की थी जिसका उद्देश्य को कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए था। कविता क्या है? हे प्रिये! कविता क्या है?कविता मधुर की मुस्कान है।भावों

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शिक्षा पर कविता

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शिक्षा पर कविता शिक्षा का अधिकार सभी कोसभी शिक्षित कीजिये।कहते है महादान इसकोदान सबको दीजिए।।1।। शिक्षा का ये क्षेत्र असीमितअनुसंधान कीजिये।अधुनातन नवतकनीकों सेजनकल्याण कीजिये।।2।। शिक्षा से कोई भी वंचितरहे ना संसार मे।शिक्षा की सब अलख जगाएंहर एक परिवार में।।3।।???शिक्षा जीवन का मूल मंत्रसबको सुलभ कराएं।मेहनतकश और शोषित भीसब जन शिक्षा पाएं।।4।। बुनियादी शिक्षा को घर

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संस्कारों पर कविता

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संस्कारों पर कविता बीज रोप दे बंजर में कुछ,यूँ कोई होंश नहीं खोता।जन्म जात बातें जन सीखे,वस्त्र कुल्हाड़ी से कब धोता। संस्कृति अपनी गौरवशाली,संस्कारों की करते खेती।क्यों हम उनकी नकल उतारें,जिनकी संस्कृति अभी पिछेती।जब जब अपने फसल पकी थी,पश्चिम रहा खेत ही बोता।बीज रोप दे बंजर में कुछ,यूँ कोई होंश नही खोता। देश हमारा जग

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गुरु घासीदास बाबा पर हिंदी कविता

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गुरू घासीदास छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ अवतरित हुये थे गुरू घासीदास जी सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी समाज कहा जाता है, के प्रवर्तक थे।

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विधवा पर कविता

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विधवा पर कविता सफेद साड़ी में लिपटी विधवाआँसुओं के चादर में सिमटी विधवामनहूस कैसे हो सकती है भला अपने बच्चों को वह विधवारोज सबेरे जगाती हैउज्जवल भविष्य कीf करे कामनाप्रतिपल मेहनत करती हैसर्वप्रथम मुख देखे बच्चेसफलता की सीढ़ी चढ़ते हैंसमझ नहीं आता फिर भीमनहूस उसे क्यूँ कहते हैं बेटी के लिए ढूँढें वर वहशादी का

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बेटियां सिर्फ होती पराई हैं…?- संतोष नेमा “संतोष”

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बेटियां सिर्फ होती पराई हैं दिल्लीहैदराबादऔऱउन्नाव..!!कहाँ हैबेटियों कासुरक्षितठाँव..??शहरदर शहरदरिंदगीबदस्तूरजारी है.!!घटनाओं कीखिलतीरोज नईएक पारी है..!!नेता अबनित नएबयानफेंकते हैं..!ऐसे मौकों पर भीराजनीतिकरोटियांसेंकते हैं..!!क्या यहीपरिदृश्यहै आज का..?हिंदुस्तानीसभ्य समाज का..!!कहाँ गएकानून केलंबे हाथ..?हम क्योंहो गएइतने अनाथ..??क्या हो गएहम इतनेकमजोर..?अपराधियों परनहीं चलताअब कोई जोर..??कब तलकबेटियाँ यूँजलाईजाएंगी..?शैतानों केहाथों यूँसताईजाएंगी..!!तथाकथितबुद्धिजीवीमौन हैं..!!ऐसीघटनाओं परभी रखतेकुछ अलगदृष्टिकोण हैं. !!!“संतोष”क्या हमारीमानसिकतायह बनआई है..!क्या बेटियाँहोतींसिर्फपराई हैं…???—————– @संतोष

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दीप से दीप जले-श्याम कुँवर भारती

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दीप से दीप जले  दिल से दिल मिले ,दीप से दीप जले |दिवाली मे हर मुख मुस्कान खिले |हर घर हो रोशनी से जगमग |घर गरीबो हो खुशिया दीप से दीप जले |मिट्टी घर ही नहीं झोपड़ी उजाला रहे |बच्चे जवान रहे मगन दीप से दीप जले |दुश्मनी दुर्दिन दुर्भिक्ष जल खाक हो |सुख शांति

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स्त्री एक दीप-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’

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स्त्री एक दीप स्त्री बदलती रहीससुराल के लिएसमाज के लिएनए परिवेश मेंरीति-रिवाजों मेंढलती रही……स्त्री बदलती रही! सास-श्वसुर के लिए,देवर-ननद के लिए,नाते-रिश्तेदारों के लिएपति की आदतों को न बदल सकीखुद को बदलती रही! इतनी बदल गयी किखुद को भूल गयी!फिरभी किन्तु परंतुचलता ही रहा,समझाइश भी मिलती-दूसरों को नहीं खुद को बदल लो! शायद थोड़ी सी बच

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स्वच्छता पर कुंडलिया

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स्वच्छता पर कुंडलिया घर घर में अब देश के, मने स्वच्छता पर्व।दूर करें सब गंदगी, खुद पर तब हो गर्व।खुद पर तब हो गर्व, न कोई कोना छोड़ें।बदलें आदत सर्व, समय का अब रुख मोड़ें।नद नालें हो साफ, बहे जल उनमें निर्झर।नया स्वच्छता भाव, पले भारत के हर घर।।1 साफ-सफाई के लिये, चलें नये अभियान।सर्व

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प्लास्टिक मिटा देंगे हम

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प्लास्टिक मिटा देंगे हम दुनिया से प्लास्टिक मिटा देंगे हम. हम तुम सनम चलो खाले कसम |दुनिया से प्लास्टिक मिटा देंगे हम | ये गलता नही मिट्टी मे मिलता नही |खाती गाये पेट उनके पचता नहीं | मरती गायों को मिल बचाएंगे हम |हम तुम सनम चलो खाले कसम | इसके बर्तन बोतल इस्तेमाल न करो

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