कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

परदेसी से प्रीत न करना

हिंदी कविता

परदेसी से प्रीत न करना तुमसे विलग   हुए तो कैसेकैसे दिवस निकालेंगे।दीप    जलाये   हैं हमने हीदीपक आप बुझा लेंगे। तन्हाई में   जब   जब यारायाद तुम्हारी आयेगी।परदेसी  से   प्रीत  न करनादिल को यों समझा लेंगे।। शायद सदमा झेल न पाओतुम मेरी बर्बादी का।अपने अंदर  ही अपने हमसारे हाल छुपा लेंगे।।झूँठा   है ये  प्यार मुहब्बतझूँठे हैं सब […]

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किसानों को समर्पित एक कविता

हिंदी कविता

किसानों को समर्पित एक कविता जेठ की तपती दुपहरी होया मूसलाधार बारिशअभावों कीकुलक्षिणी रात होया ….दक्षिणी ध्रुवी अंधकार अमावस्याजाड़े की ठिठुरन में भीऔरों की तरहनहीं सोतावह घोड़े बेचकर ..जिम्मेवारियों का निर्वहन करतेधरती के गर्भ सेजिसनेअन्न उपजामनुष्य और मनुष्यता कोजीवित रखासंसार को नया आकार देकरफसलों में मुस्कान बिखेरीदलदली पंक को रास्ता बनानवांकुरों को चलना सिखायामगर!विडम्बना ऐसीकि

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shri Krishna

माधव श्री कृष्ण पर कविता

हिंदी कविता

माधव श्री कृष्ण पर कविता सबके दिल मे रहने वाला,माखन मिश्री खाने वाला।गाय चराते फिरते वन मे,सुंदर तान सुनाने वाला ।खेल दिखाते सुंदर केशव,सबके मन को भाने वाला।भाये ना केशव मुझको अब,   हर  दस्तूर जमाने वाला।ध्यान धरे है माधव सबकी,दुख सबके है हरने वाला।क्यों ऐसी बातें करता हैं ,हिंसा को भड़काने वाला।      जागृति मिश्रा

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फिर जली एक दुल्हन

हिंदी कविता

फिर जली एक दुल्हन शादी का लाल जोड़ा पहन,ससुराल आई एक दुल्हन,आंखों में सजाकर ख्वाब,खुशियों में होकर मगन! रोज सुबह घबरा सी जाती,बन्द सी हो जाती धड़कन,ना जाने कब बन जाये,लाल जोड़ा मेरा कफ़न! फिरभी सींचे प्यार से,अपना छोटा सा चमन,खुशियों से महके आँगन,नित नए खिलते सुमन! एक रोज अखबार देखा,आज भी अग्नि-दहन,दहेज की ही

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manibhai Navratna

मनीलाल पटेल उर्फ़ मनीभाई नवरत्न के कविता

समाज और यथार्थ

मनीलाल पटेल उर्फ़ मनीभाई नवरत्न के कविता एक अजब खिलखिल है जान अकेली है।मौत सहेली है।काँपती देहहवा बर्फीली है । चादर आसरा हैदहक सहारा है।दंत की किटकिटसर्द की नारा है। तन में ठिठुरन है ।मन में जकड़न है ।जग धुंधला सारज को अड़चन है । हर पल को मुश्किल है ।ठंड जिनकी कातिल है।रंग बदला

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जा लिख दे

हिंदी कविता

जा लिख दे “साधु-साधु!”लेखनी लिखे कुछ विशेषदें आशीषमैं भी कुछ ऐसा लिख जाऊँजो रहे संचित युगों-युगोंचिरस्थायी,शाश्वत–’जा लिख दे अपना वतन’जो सृष्टि संग व्युत्पन्नआश्रयस्थल प्रबुद्धजनों का,शूरवीरों काप्रथम ज्ञातारहेगा समष्टि के अंत बाद भी। –’जा लिख दे उस माँ का वर्णन’जो जाग-जाग और भाग-भागनिज सन्तति हित सर्वस्व लुटायेजो पूत प्रेम औरवीर धर्म का पाठ पढ़ायेसर्व जगत की

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बहुरूपिया

हिंदी कविता

बहुरूपिया बकरी बनकर आया,मेमने को लगाकर सीने से,प्यार किया,दुलार किया!दूसरे ही क्षण–भक्षण कर मेमने का,तृप्त हो डकारा,बहुरूपिये भेड़िये ने फिर,अपना मुखौटा उतारा!!—-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’अम्बिकापुर,सरगुजा(छ. ग.)

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काली कोयल

हिंदी कविता

काली कोयल कोयल सुन्दर काली -काली,हरियाले बागों की मतवाली।कुहू-कूहू करती डाली-डाली,आमों के बागों मिसरी घोली। ‘चिड़ियों की रानी’ कहलाती,पंचमसुर में तुम राग सुनाती।हर मानव के कानों को भाती,मीठी बोली से मिठास भरती। मौसम बसंत बहुत सुहाना,काली कोयल गाती तराना।रूप तुम्हारा प्यारा सयाना,जंगलवासी का मन हरना। कोकिला, कोयल, वनप्रिया,बसंतदूत,सारिका नाम पाया।पेड़ों के पत्तों में छिप जाया,मीठी

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भावना तू कौन है ?

मन और भावनाएँ

भावना तू कौन है ? क्रोध लोभ हास मेरात में प्रकाश मेंराग और द्वेष मेंप्रीत नेह क्लेश मेंदेखता हूँ मौन हैभावना तू कौन है? भय अभय चित्त मेंहार में व जीत मेंभूख और प्यास मेंदूर हो या पास मेंदेखता हूँ मौन हैभावना तू कौन है ? अश्रु जब पड़े ढुलककांपने लगे अधरतू बड़ी उदास सीमन

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अपनापन पर कविता

हिंदी कविता

अपनापन पर कविता अपनापन ये शब्द जहां काहोता सबसे अनमोलप्यार नेह से मिल जातासंग जब हों मीठे बोल। अपनापन यदि जीवन में होहर लम्हा रंगे बहारअपने ही गैर बन जाएं तोग़म का दरिया है संसार। अपनेपन की अभिलाषी थीमैं अपनों की भीड़ मेंसमझ न पाया मर्म मेरा कोईबह गई मैं इस पीर में। अपनों ने

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मातृभूमि पर कविता

हिंदी कविता

मातृभूमि पर कविता मातृभूमि के लिये नित्य ही,अभय हो जीवन दे  दूंगा ।तन ,मन , धन निस्वार्थ भाव,सर्वस्व समर्पित  कर   दूंगा। जिस  मातृभूमि में जन्म लिया है,जिसके  अंक  नित  खेल    हूँ।शिवा जी दधीचि की मिट्टी   कामत   भूलो मैं    चेला        हूँ। जहाँ  आदिकाल   से    वीरों    नेगिन- गिन  कर शीश     चढा़ये है।वीर शिवाजी,     महाराणा    ने,जीवन    दांव पर  

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चक्रव्यूह में फंसी बेटी- कृष्ण सैनी

नारी जीवन और संवेदना

चक्रव्यूह में फंसी बेटी                       (1)बर्फीली सर्दी में नवजात बेटी को,जो छोड़ देते झाड़ियों में निराधार।वे बेटी को अभिशाप समझते,ऐसे पत्थर दिलों को धिक्कार।                    (2)जो कोख में ही कत्ल करके भ्रूण,मोटी कमाई का कर रहे व्यापार।निर्दयी माता-पिता फोड़े की तरह,गर्भपात करवाकर बन रहे खूंखार।                      (3)सृजन की देवी के प्रति मेरे स्नेहभाव,घर में खुशहाली सी छाई

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