पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम
समाज और यथार्थ“पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम” वे तुम्हें बताते हैं—तुम अधूरे हो।आईने में नहीं,विज्ञापन में दिखाते हैंतुम्हारा चेहरा। कहते हैं—तुम जैसे हो,वैसे काफ़ी नहीं। यहीं सेसौदा शुरू होता है। पहलेमन मेंकमी बोई जाती है—तुम सफल नहीं,तुम सुंदर नहीं,तुम योग्य नहीं। फिर मुस्कराकरमरहम बढ़ाया जाता है—हमारे लिए काम करो,हमारी परिभाषा कासपना देखो,हमारी चीज़ें ख़रीदो—तभीतुम पूरे होओगे।
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