कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम

समाज और यथार्थ

“पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम” वे तुम्हें बताते हैं—तुम अधूरे हो।आईने में नहीं,विज्ञापन में दिखाते हैंतुम्हारा चेहरा। कहते हैं—तुम जैसे हो,वैसे काफ़ी नहीं। यहीं सेसौदा शुरू होता है। पहलेमन मेंकमी बोई जाती है—तुम सफल नहीं,तुम सुंदर नहीं,तुम योग्य नहीं। फिर मुस्कराकरमरहम बढ़ाया जाता है—हमारे लिए काम करो,हमारी परिभाषा कासपना देखो,हमारी चीज़ें ख़रीदो—तभीतुम पूरे होओगे।

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जब सफलता स्वयं को असफल कर दे

समाज और यथार्थ

“जब सफलता स्वयं को असफल कर दे” हम कहते हैं—मैं आगे बढ़ रहा हूँ।तनख़्वाह बढ़ी,पहचान बढ़ी,अनुभव जुड़ते गए। पर किसी ने नहीं पूछा—किसके लिए? जिसके लिएदिन-रात दौड़े,वही भीतरऔर थक गया। पैसा जमा हुआजैसे अलमारी में कपड़े,पर मननंगा ही रहा। डिग्रियाँ आईं,सम्मान मिला,पर नींदऔर हल्की हो गई। अगर यह विकास है,तो फिरघबराहट क्यों बढ़ी? हम जो

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अपने आप को दूसरा जन्म दो

समाज और यथार्थ

“अपने आप को दूसरा जन्म दो” पहला जन्ममाँ की कोख से होता है—शरीर मिलता है,नाम मिलता है,पर मैं कौन हूँयह नहीं मिलता। बच्चा रोता है,भूख लगती है,डर लगता है—यह प्रकृति सिखाती है। पर बड़ा होकर भीअगर आदमीसिर्फ़भूख, डर और लालच मेंही जीता रहे—तो जन्म अधूरा है। एक उदाहरण देखो—एक बच्चाखिलौना छिनते हीमारने दौड़ पड़ता है।अगर

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आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear)

हिंदी कविता

आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear) डर का इलाजआत्मविश्वास नहीं होता।वह केवलडर पर डाला गयाएक मुखौटा है। गोली की तरह—क्षणिक राहत,पर बीमारी जस की तस। डर मिटता नहीं,चुपचाप भीतरऔर गहराता है। निर्भयतासीना तानकर खड़े होने में नहीं,बल्किकिसी के सामनेखड़े होने की ज़रूरत न रहने में है। जब खोने कोकुछ नहीं होता,तो डर किस बात

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दूर हटने का साहस

हिंदी कविता

दूर हटने का साहस साहस हर चुनौती परतलवार खींच लेना नहीं है।साहस हैयह जान लेनाकौन-सी लड़ाई तुम्हारी हैऔर कौन-सी नहीं। जो लड़ाई तुम्हें परिभाषित करती है,उससे पीछे मत हटो।जहाँ प्रश्न आत्मा का हो,वहाँ समझौता मत करो। पर हर उकसावे परप्रतिक्रिया देनासाहस नहीं है।हर जगह शक्ति दिखानाअपरिपक्वता है। सच्चा शत्रु बाहर नहीं,अंदर है—डर, आदतें,आसक्तियाँ,अहंकार। अधिकतर समस्याएँछलावा

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काँपते हाथों से (With Trembling Hands)

हिंदी कविता

काँपते हाथों से (With Trembling Hands) निर्भयताभय का अभाव नहीं है।निर्भयता है—भय के होते हुए भीसही करना। तुम पूछते हो—क्या काँपते हाथसही कर्म कर सकते हैं?हाँ।और उसी मेंएक गहरा आनंद छिपा है। गलत रास्ताअक्सर सहज लगता है।वह तुम्हारी आदतों के साथबहता है।कोई विरोध नहीं,कोई कीमत नहीं। पर सत्य?वह चुनौती देता है।उसकी ओर कदम रखते हीभीतर

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डर कमजोरी नहीं, संदेश है

हिंदी कविता

डर कमजोरी नहीं, संदेश है डर दुश्मन नहीं है।वह यूँ ही नहीं आता।वह एक संदेश लेकर आता है—यहाँ कुछ अधूरा है। वह बाहर की ओर इशारा नहीं करता,वह भीतर की दरार दिखाता है।जहाँ तुम सत्य में जड़े नहीं हो,जहाँ तुम उधार के सहारों पर खड़े हो। डर कहता है—यहाँ तुम अभी वास्तविक नहीं हो। अगर

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भय झूठा है—परखो उसे

हिंदी कविता

भय झूठा है—परखो उसे डर किसी घटना से नहीं आता,डर आता हैअपने ही टूट जाने की कल्पना से। तुम कहते हो—“कुछ बुरा हो जाएगा।”पर सच यह है—डर खुदसबसे बुरा हो चुका है। घटना नहीं डराती,तुम्हारी नाज़ुकता डराती है।यह मान लेना कितुम सह नहीं पाओगे। अगर तुम कह सको—होने दो जो होना है,दुनिया बिखर जाए,पर मैं

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जब मन गुर्राए, सुनो

हिंदी कविता

जब मन गुर्राए, सुनो डर, उथल-पुथल, बेचैनी—इन्हें शत्रु मत समझो।ये तुम्हें डराने नहीं,कुछ बताने आते हैं। जब भीतर सब ठीक नहीं लगता,तो उसे दबाओ मत।पूर्ण शांति तुम्हारी प्रकृति है।उससे कम कुछ भीसंकेत है। मन का अशांत होनाकभी यूँ ही नहीं होता।वह उसी बोझ को ढोता हैजिसे तुमने मूल्य दिया है। जो बेकार है,वह क्यों बचा

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पीठ पीछे कुछ टिक रहा है

हिंदी कविता

पीठ पीछे कुछ टिक रहा है समय को सँभालने के उपाय मत पूछो,खुद को सँभालना सीखो। तुम्हारे घंटे,तुम्हारे मिनट—वे घड़ी नहीं,आईना हैं।उनमें दिखता हैतुम्हारा मन,तुम्हारी प्राथमिकताएँ,तुम्हारे असली मूल्य। ट्रेन छूटे तो समझ आता है—समय लौटता नहीं।मौत छुए तो दिखता है—समय अनंत नहीं,हर सेकंड वाष्पित हो रहा है। पर अजीब भ्रम है—सब कुछ जाएगा,पर मैं नहीं।ट्रेन

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क्षुद्र को जाने दो

हिंदी कविता

क्षुद्र को जाने दो (Let the Petty Go) यदि तुम्हारा आत्म-मूल्यकिसी भी चीज़ पर टिका है,तो जीवनउसे डोरियों की तरह हिलाएगा,और तुम्हेंकठपुतली बना देगा। परिस्थितियाँ,संपत्ति,उपलब्धियाँ,मंज़िलें—इनमें से किसी कोअपने नाम की परिभाषा मत बनने दो। जो बाहर हैवह ठहरता नहीं।जो ठहरता नहीं,उस पर आत्म-मूल्य टिकानास्वयं को अस्थिर करना है। आत्म-मूल्य भी एक विचार है,और हर विचारकिसी

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सुधार रणनीति नहीं

हिंदी कविता

सुधार रणनीति नहीं सच्चा सुधार तब शुरू होता है,जब तुम अपने आप से झूठ बोलना बंद करो। जब तुम अपनी स्थिति देखोजैसी है वैसी—बिना सजावट, बिना बहाने। मूल्यांकन चुपचाप हो,किसी को बताने की जरूरत नहीं।घाव पहनने की जरूरत नहीं।पर खुद को सच बताना ज़रूरी है। जब स्पष्टता आती है,परिवर्तन अपने आप होता है।झूठ खुद टूट

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