धरती पर कविता/ डॉ विजय कुमार कन्नौजे
प्रकृति और पर्यावरणधरती पर कविता/ डॉ विजय कुमार कन्नौजे जलती धरती तपन ज्वलनक्रोधाग्नि सा ज्वाला।नशा पान में चुर हो बनते पाखंडी है मतवाला।। काट वृक्ष धरा किन्ह नगनधरती जलती , तु हो मगनवाह रे मानव,खो मानवताक्या सृष्टि का है यही लगन।। जरा सोचो,कुछ कर रहमना कीजिए प्रकृति दमनतेरा प्राण बसा है वहींधरती पवन और गगन।। कैसा मानव
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