कविता बहार

कवि का धर्म निभाना – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

विश्व कविता दिवस (अंग्रेजी: World Poetry Day) प्रतिवर्ष २१ मार्च[1] को मनाया जाता है। यूनेस्को ने इस दिन को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा वर्ष 1999[2] में की थी जिसका उद्देश्य को कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए था। कवि का धर्म निभाना है . ककुभ

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नारी रत्न अमूल्य धरा पर(चौपाई छंद)

नारी जीवन और संवेदना, हिंदी कविता

नारी रत्न अमूल्य धरा पर (चौपाई छंद) नारी रत्न अमूल्य धरा पर।ईश्वर रूप सकल सचराचर।।राम कृष्ण जन्माने वाली।सृष्टि धर्म की सत प्रतिपाली।।१.बेटी बहिन मात अरु दारा।हर प्रतिरूप मनुज उद्धारा।।नारी जग परहित तन धारी।सुख दुख पीड़ा सहे दुधारी।।२.द्वय घर की सब जिम्मेदारी।बिटिया वहन करे वह सारी।।पढ़ी लिखी जब होती नारी।दो दो घर बनते संस्कारी।।३.शान मान अरमान

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विश्व कविता दिवस – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

विश्व कविता दिवस (अंग्रेजी: World Poetry Day) प्रतिवर्ष २१ मार्च को मनाया जाता है। यूनेस्को ने इस दिन को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा वर्ष 1999में की थी जिसका उद्देश्य को कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए था। कलम चले कालचक्र सी . (१६मात्रिक)कलम चले यह कालचक्र सी,लिखती नई इबारत

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भगवान सहस्त्रबाहु अर्जुन

समाज और यथार्थ

भगवान सहस्त्रबाहु अर्जुन कार्तिक मास शुक्ल सप्तमी को हुआ सहस्त्रबाहु का अवतरण।राजराजेश्वर,कार्तवीर्य,सहस्त्रार्जुन नाम,दशानन आया शरण।महाराज हैहय की दसवीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के थे संतान।सुदशेन,चक्रावतार,सप्तद्रवीपाधि,दशग्रीविजयी थे कृतवीर्यनन्दन।1।चंद्रवंशी महाराजा कृतवीर्य के थे परमवीर चक्रवर्ती एकमात्र संतान।दत्तात्रेय से हजार हाथ का वरदान ले मिला सहस्त्रबाहु अर्जुन नाम।विष्णु के 24वें अवतार,है भागवतकथा में इनका वर्णन।लंकापति रावण को हराया,मिला

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हरे यादों के पन्ने-सुकमोती चौहान “रुचि”

हिंदी कविता

हरे यादों के पन्ने किया याद है कौन , हिचकियाँ मुझको आई ।गुजरे अरसे बाद , कसक हिचकोले खाई ।जिल्द पुराने झाड़ , हरे यादों के पन्ने ।अधर खिला मुस्कान , नेत्र जल मीठे गन्ने ।कुछ यादें जीवन के अमर , अनायास ही उभरते ।निराकार अव्यक्त ये , मानस पट पर विचरते । आया बचपन

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प्रेम का अनुप्रास बाकी

हिंदी कविता

प्रेम का अनुप्रास बाकी आर आर साहू, छत्तीसगढ़: ” प्रेम का अनुप्रास बाकी “ सत्य कहने और सुनने की कहाँ है प्यास बाकी।क्या विवशता को कहेंगे,है अभी विश्वास बाकी। आस्थाओं,धारणाओं,मान्यताओं को परख लो,रह गई संवेदना की आज कितनी साँस बाकी। दृष्टिहीनों को तमस् का बोध कैसे हो सकेगा,है नहीं जिनके दृगों में ज्योति का उल्लास

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कहानी कैसे लिखें

मन और भावनाएँ

कहानी, हिन्दी में गद्य लेखन की एक विधा है। उन्नीसवीं सदी में गद्य में इस नई विधा का विकास हुआ .कहानी कैसे लिखें यहाँ इस बात की जानकारी दी जा रही है

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लघुकथा कैसे लिखें

समाज और यथार्थ

लघुकथा कैसे लिखें लघुकथा-विधा हिन्दी गद्य साहित्य की ऐसी विधा है, जिसमें कम से कम शब्दों में एक गहरी बात कहना होता है जिसको पढ़ते ही झटके से पाठक मन चिंतन के लिए उद्वेलित हो जाये। राजनैतिक, सामाजिक व पारिवारिक परिवेश में सूक्ष्म से सूक्ष्म विसंगतिपूर्ण मानसिकता को चिंहित कर वास्तविकता के धरातल पर तर्कसंगत

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चतुष्पदी (मुक्तक) क्या है ? इसके लक्षण व उदाहरण

हिंदी कविता

चतुष्पदी (मुक्तक) क्या है ? इसके लक्षण व उदाहरण चतुष्पदी (मुक्तक)— समान मात्राभार और समान लय वाली रचना को चतुष्पदी (मुक्तक) कहा गया है । चतुष्पदी में पहला, दूसरा और चौथा पद तुकान्त तथा तीसरा पद अतुकान्त होता है और जिसकी अभिव्यक्ति का केंद्र अंतिम दो पंक्तियों में होता है ! यूं कह सकते हैं

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माता पिता पर रचना

हिंदी कविता

माता पिता पर रचना ‌जिनकी वजह से खडे हो।आज सोचते ‍‌‌‌‌‌‍‍‌‌‌ हो उनसे बड़े हो।। आज रुकते नहीं है ये आंसू।छोटी सी बात लेकर लड़े हो।। गलतियां तूने की थी हजारों ।पूछा एक बार ना क्यों अडे़ हो।। जानते हो वो पूजन के लायक ।पूछते हो, क्यों बिस्तर पड़े हो।। चोट ऐसी ना सह पयोगे

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ननपन के सुरता (छत्तीसगढ़ी कविता)

हिंदी कविता,

ननपन के सुरता (छत्तीसगढ़ी कविता) ➖➖➖➖➖➖रचनाकार-महदीप जंघेलग्राम-खमतराई,खैरागढ़जिला- राजनांदगांव(छ.ग)विधा-छत्तीसगढ़ी कविता पहली के बात, मोर मन ल सुहाथे।ननपन के सुरता मोला अब्बड़ आथे।। होत बिहनिया अंगाकर रोटी ल,खाय बर अभर जावन।कमती खा के घलो,दाई के मया अउदुलार ले अघा जावन।।दूध दही मही अउ घीव घलो,जम के खावन।दिन भर खेलकूद के ,सब्बो ल पचावन।।तिहार के ढिलबरा कोचई कढ़ी,मोला

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गुरु की महिमा – एन्०पी०विश्वकर्मा

हिंदी कविता

महर्षि वेद व्यासजी का जन्म आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को ही हुआ था, इसलिए भारत के सब लोग इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं। जैसे ज्ञान सागर के रचयिता व्यास जी जैसे विद्वान् और ज्ञानी कहाँ मिलते हैं। व्यास जी ने उस युग में इन पवित्र वेदों की रचना की जब शिक्षा

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