हरिहरण छंद
नारी जीवन और संवेदनाहरिहरण छंद- शिल्प – चार चरण , प्रतिचरण ३२ वर्ण , ८,८,८,८, वर्ण पर यति, प्रत्येक यति के अंत में लघु-लघु ||
हरिहरण छंद- शिल्प – चार चरण , प्रतिचरण ३२ वर्ण , ८,८,८,८, वर्ण पर यति, प्रत्येक यति के अंत में लघु-लघु ||
दिसंबर महीने पर कविता आ गये दिसंबर केठिठुराते दिन।कोहरे की चादर धूप भाये पल झिन । आ गये दिसंबर के ठिठुराते दिन । लुका छुपी करतासूरज दादा आसमां पेबेमौसम पानी बरसे रिमझिम । आ गये दिसंबर के ठिठुराते दिन । काँप रहे दादा जी जला रहे अलावदादी बुला रही अरेसोनू मोनू जल्द आवदाँत किटकिटाते पानी
दिसंबर महीने पर कविता Read More »
सायली विधा में रचना – मधुमिता घोष बचपनबीत गयाआई है जवानीउम्मीदें बढ़ीसबकी. चलोउम्मीदों केपंख लगा करछू लेंआसमाँ. आँखेंभीगी आजयादों में तेरीखो गयेसपने. सपनेखो गयेइन आँखों केबिखर गईआशायें. मधुमिता घोष “प्रिणा”
सायली विधा में रचना – मधुमिता घोष Read More »
चल मेरे भाई – वन्दना शर्मा चलो आज गुजार लेते हैं कुछ खुशी के लमहे,बन जाते हैं एक बार फिरसिर्फ इंसान,और चलते हैं वहाँउसी मैदान में जहाँ,राम और रहीम एक साथ खेलते हैं।चढ़ाते हैं उस माटी का एक ही रंगचलते हैं उस मंदिर और मस्जिद के विवाद की भूमि परदोनों मिलकर बोएँगे प्रेम के बीजचल
चल मेरे भाई – वन्दना शर्मा Read More »
आईना पर कविता – कुमुद श्रीवास्तव वर्मा हमको, हमीं से मिलाता है आईना. इस दिल के जज्बात बताता है आईना. हुआ किसी पे फिदा ,ये बताता है आईना. संवरनें की चाह जगाता है आईना. उम्र के तजुर्बों को बताता है आईना. चेहरे की लकीरों को दिखाता है आईना बालों की सफेदी को बताता ये आईना
आईना पर कविता – कुमुद श्रीवास्तव वर्मा Read More »
शीत ऋतु पर हाइकु – धनेश्वरी देवांगन सिंदुरी भोर धरा के मांग सजी लागे दुल्हन नव रूपसी दुब मखमली सी छवि न्यारी सी कोहरा छाया एक पक्ष वक्त का दुखों का साया शीत अपार स्वर्णिम रवि रश्मि सुख स्वरूप ओस के मोती जीवन के
शीत ऋतु पर हाइकु – धनेश्वरी देवांगन Read More »
रुक्मणि मंगल दोहे / पुष्पा शर्मा “कुसुम” विप्र पठायो द्वारिका,पाती देने काज।अरज सुनो श्री सांवरे,यदुकुल के सरताज।। रुक्मणि ने पाती लिखी,सुनिये श्याम मुकुंद।मो मन मधुप लुभाइयो,चरण- कमल मकरंद।। सजी बारात विविध विधि,आय गयो शिशुपाल।सिंह भाग सियार कहीं,ले जावे यहि काल।। जो न समय पर पहुँचते,यदुवर चतुर सुजान।देह धरम निबहै नहीं,तन न रहेंगे प्राण।। त्रिभुवन सुन्दर
रुक्मणि मंगल दोहे / पुष्पा शर्मा “कुसुम” Read More »
हार कर जीतना – पूनम दुबे सही तो है हार कर भी,मैं जीत रही हूं,तुम्हारे लिए कभी बच्चों,के लिए कभी परिवार ,के लिए मैं हार कर भी जीत ,रही हूं,क्या हुआ अगर मेरे आत्मसम्मान परचोट लगती,है मेरे आंसुओं से क्या फर्क,पड़ता है ,बात तो ठहरजाती है ना, सबकी बातरह तो जाती है ना, मैं भी
हार कर जीतना – पूनम दुबे Read More »
आखिर कब आओगे – रश्मि शर्मा मुझे अकेला छोड़कर कहाँ जाओगे तुम,इन्हीं राहों में खड़ी हुँ कभी तो मिलोगे तुम। छोटी सी बात पर आंख फेर ली तुमने,कब तक यूँ मुझसे रूठे ही रहोगे तुम। रात भर जागती रही आंखे मेरी यहाँ,सपनों में न आकर मुझे सताओगे तुम। मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही
आखिर कब आओगे – रश्मि शर्मा Read More »
चल मुसाफिर चल-केवरा यदु “मीरा “ जिन्दगी काँटों भरी है चल मुसाफिर चल ।गिर गिर कर उठ संभल मुसाफ़िर चल । लाख तूफाँ आये तुम रूकना नहीं।मंजिलों की चाह है झुकना नहीं ।मंजिल तुझे मिल जायेगी आज नहीं तो कल। याद रख जो आँधियों से है टकराते ।मंजिल कदम चूमने उनके ही आते।गुनगुनाना कर मुस्कुरा
साल ही तो है कुछ को होगी ख़ुशी, कोई ग़म से भर जाएगान जाने ये नया साल भी, क्या कुछ कर जाएगा कुछ अरमान होंगे पूरी इसमें उम्मीद है हमेंऔर कुछ इस साल कि तरह ख़ुद में मर जाएगा टूटा है गर मोहब्बत तो, हो ही जाएगा दोबाराबस देखो एहतियातन वहाँ तज जहाँ तक नज़र
धर्म एक धंधा है गंगाधर मनबोध गांगुली “सुलेख “ समाज सुधारक ” युवा कवि “ क्या धर्म है ,क्या अधर्म है ? आज अधर्म को ही धर्म समझ बैठें हैं । धर्म से ही वर्ण व्यवस्था , समाज में आया है ।धर्म ही इंसान को , इंसान का दुश्मन बनाया है ।।01।। वर्ण व्यवस्था बाद