हिंदी कविता

atal bihari bajpei

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण

महामानव अटल बिहारी बाजपेयी पर कविता मानवता के प्रेणता थे।            राष्ट के जन नेता थे।भारत माँ के थे तुम लाल।       प्रजातंत्र में किया कमाल।।विरोधी भी कायल थे।         दुश्मन भी घायल थे।।पत्रकार व कवि सुकुमार।        प्रखर वक्ता में थे सुमार।।जीवन की सच्चाई लिखने वाले।     सबके दिलो को जीतने वाले।।तुम्हारे मृत्यु पर दुनिया रोया है।आसमान मे घने कोहरे होया […]

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मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ

हिंदी कविता

मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ, मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ,जब आँखों से मोहब्बत देखता हूँ।अब जल्दी नहीं कि सामने आओ मेरे,मैं तो तस्वीर भी दूर कर देखता हूँ।जहां में सब उजाले में देखते हैं तुम्हें,मैं तो अंधेरे में तेरा चेहरा देखता हूँ।सब तुझमें, खुद को देखना चाहते थे,मैं चाहता

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नमन करुँ मैं अटल जी

हिंदी कविता

नमन करुँ मैं अटल जी नमन करुँ मैं अटल जी तुमको नत हो बारम्बार,जन्म लिया भारत भूमि पर ,जन नेता अवतार। बन अजातशत्रु तुमने मन मोह लिया जन जन काभारत माँ पे निछावर हो,अर्पण किया तन मन का नमन करुँ हे संघ प्रचारक, कवि हृदय जन नेता।राजनीति के प्ररेक पोषक,राष्ट्र भक्ति प्रणेता। नमन करे ये

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इन गुलमोहरों को देखकर

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कविता/निमाई प्रधान’क्षितिज’ इन गुलमोहरों को देखकर दिल के तहखाने में बंद कुछ ख़्वाहिशें…आज क्यों अचानक बुदबुदा रही हैं?महानदी की… इन लहरों को देखकर!! कि ननिहाल याद आता है..इन गुलमोहरों को देखकर!! शाही अपना भी रूतबा थामामाजी के गाँव में!!बचपन में हम भी..हुआ करते थे राजकुमार..सुबहो-शाम घूमा करते थेनाना की पीठ पर होके सवार..हमारे हर तोतले

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चिड़िया पर कविता

हिंदी कविता

थके पंछी थके पंछी आजफिर तूँ उड़ने की धारले,मुक्त गगन है सामनेतूँ अपने पंख पसारले। देख नभ में, नव अरुणोदयहुआ प्रसूनों का भाग्योदय,सृष्टि का नित नूतन वैभवसाथियों का सुन कलरवअब हौंसला संभाल ले । शीतल समीर बह रहासंग-संग चलने की कह रहा,तरु शिखा पर झूमतेफल फूल पल्लव शोभतेत्याग दे आलस्य निद्राअवरुद्ध मग विकास काआज अब

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भ्रूणहत्या-कुण्डलिया छंद

हिंदी कविता

भ्रूणहत्या-कुण्डलिया छंद साधे बेटी मौन को, करती  एक गुहार।जीवन को क्यों छीनते ,मेरे सरजनहार।मेरे सरजनहार,बतायें गलती मेरी।कहँ भू पर गोविंद , करे जो रक्षा  मेरी।“कुसुम”कहे समझाय  , पाप   जीवन भर काँधे। ढोवोगे दिन रैन ,दुःख यह मौनहि  साधे। पुष्पा शर्मा “कुसुम”

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पथ की दीप बनूँगी

हिंदी कविता

पथ की दीप बनूँगी प्रिय तुम न होना उदास तेरे पथ की दीप बनूँगी ।फूल बिछा कर पग पर तेरे काँटे सदा वरण करूँ गी ।।तेरे पथ की दीप बनूँगी। ना  मन  हो  विकल  न उथल पुथल ।मनों भाव अर्पित कर अधर की मुस्कान बनूँगी । तेरे पथ की दीप बनूँगी। जिन्दगी में कभी गम

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भावी पीढ़ी का आगामी भविष्य

समाज और यथार्थ

भावी पीढ़ी का आगामी भविष्य हमें सोचना तो पड़ेगा।परिवार की परंपरासमाज की संस्कृतिमान्यताओं का दर्शनव्यवहारिक कुशलताआदर्शों की स्थापना।निरुद्देश्य तो नहीं!महती भूमिका है इनकीसुन्दर,संतुलित और सफल जीवन जीने में। जो बढता निरंतरप्रगति की ओरदेता स्वस्थ शरीर ,सफल जीवन और सर्वहितकारी चिन्तन।हम रूढियों के संवाहक न बने।कुरीतियों की हामी भी क्यों भरें। बचें छिछले ,गँदले गड्ढों के

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एक बार लौट कर आ जाते

हिंदी कविता

अगर वह एक बार लौट कर आ जाते तालाब के जल पर एक अस्पष्ट सा,उन तैरते पत्तों के बीचएक प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ा,तभी जाना… मेरा भी तो अस्तित्व है।झुर्रियों ने चेहरे पर पहरा देना शुरू कर दिया था।कुछ गड्ढे थे. जो चेहरे पर अटके पड़े थेंजिस पर आँखों से गिरी कुछ बूंदें अपना बसेरा बनाए हुए

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morning

प्रातःकाल पर कविता

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प्रातःकाल पर कविता श्याम जलद की ओढचुनरिया प्राची मुस्काई।ऊषा भी अवगुण्ठन मेंरंगों संग नहीं आ पाई। सोई हुई बालरवि किरणेअर्ध निमीलित अलसाई।छितराये बदरा संग खेलेभुवन भास्कर छवि छाई। नीड़ छोड़  चली अब तोपंछियों की सुरमई पाँत।हर मौसम में  रहें कर्मरतसमझा जाती है यह बात। पुष्पा शर्मा “कुसुम”

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हम हलचल कर देंगे

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

हम हलचल कर देंगे         (प्रॉज शैली में)             तर्क,      कुछ निकलेंगे..कुछ अंधविश्वास टूटेंगे।  ज्ञान ग्रहण जो सार,    हम तुम खोजते,       ग्रहण जो,         करेंगे।             हर,       पक्ष विपक्ष,     हर पहलु का,  कोई न कोई सार,  निकलता है प्यारे,   अनुसंधान जो,         करेंगे।           भावी,        भूत वर्त,      सब कुछ है,विज्ञान के पहिये में,     बस संग जो,     चक्रण

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छूकर मुझे बसंत कर दो

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छूकर मुझे बसंत कर दो – निमाई प्रधान तुम बिन महज़ एक शून्य-सा मैंजीकर मुझे अनंत कर दो ….। पतझर-पतझर जीवन हैछूकर मुझे बसंत कर दो ।। इन्द्रधनुष एक खिल रहा है, मेरे हृदय के कोने में…..बस जरुरत एक ‘हाँ’ की …शून्य से अनंत होने में ।छू लो ज़रा लबों को मेरे..शंकाओं का अंत कर

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