हिंदी कविता

सुसंस्कृत मातृभाषा दिवस पर कविता

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मातृभाषा दिवस पर कविता अपनी स्वरों में मुझको ‘साध’ लीजिए।मैं ‘मृदुला’, सरला, ले पग-पग आऊँगी।। हों गीत सृजित, लयबद्ध ‘ताल’ दीजिए।मधुरिमा, रस, छंद, सज-धज गाऊँगी।। सम्प्रेषित ‘भाव’ सतत समाहित कीजिए।अभिव्यंजित ‘माधुर्य’, रंग-बिरंगे लाऊँगी।‌। ‘मातृभाषा’ कर्णप्रिया, ‘सुसंस्कृत’ बोलिए।सर्व ‘हृदयस्थ’ रहूँ, ‘मान’ घर-घर पाऊँगी।। – शैलेंद्र नायक ‘शिशिर’

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हम किधर जा रहे हैं ?

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

हम किधर जा रहे हैं क़यास लगाए जा रहे हैं,कि हम ऊपर उठ रहे हैं,क़ायम रहेंगे ये सवालात,कि हम किधर जा रहे हैं? कल, गए ‘मंगल’ की ओर,फिर ‘चंदा-मामा’ की ओर,ढोंगी हो गए, विज्ञानी बन,कब लौटेंगे ‘मनुजता’ की ओर? ‘संस्कृति’, ‘संस्कार’ ठेके पर हैं,‘देश’ और ‘शिक्षा’ ठेके पर हैं,जनता, सिर्फ पेट भरकर खुश है,‘सरकार’, ‘अदालत’

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सपनो पर कविता

हिंदी कविता

सपनो पर कविता सपनो में सितारे सजने दो,नदियों की धाराएँ बहने दो।शीतल हवाएँ मन की तरंगें,फूलों की खुशबू महकने दो। ऊँचे अरमानों को सजने दो,आकाश में पंछी उड़ने दो।समन्दर की ये सुहानी लहरे,जल में मछलियाँ तैरने दो। नजरों में नजारे रहने दो,पलकों में चाँद उतरने दो।बदले तो बदले ये जमाना,हर किसी को दीवाने रहने दो।

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हमसफ़र पर कविता

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हमसफ़र पर कविता प्यार का ओ एहसास हो,हमसफ़र मेरा साथ हो।कठिन रास्ते में निकला हूँ,इस सफर में तू मेरा साथ हो। ओ महफ़िल की रागिनी हो,ओ संगीत की तू वादिनी हो।दिल में बसे हो हमसफ़र,अँधेरे में तू मेरी चाँदनी हो। मेरी हर खुशी में तू साथ हो,दिल से जुड़ी तू खास हो।मेरे हमराही मेरे हमसफ़र,सदा

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पुराने दोस्त पर कविता

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पुराने दोस्त पर कविता हम दो पुराने दोस्तअलग होने से पहलेकिए थे वादेमिलेंगे जरूर एक दिन लंबे अंतराल बादमिले भी एक दिन उसने देखा मुझेमैंने देखा उसेऔर अनदेखे ही चले गए उसने सोचा मैं बोलूंगामैंने सोचा वह बोलेगाऔर अनबोले ही चले गए उसने पहचाना मुझेमैंने पहचाना उसेऔर अनपहचाने ही चले गए वह सोच रहा थाकितना झूठा

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रिश्ते पर कविता

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रिश्ते पर कविता दर्द कागज़ पर बिखरता चला गयारिश्तों की तपिश से झुलसता चला गयाअपनों और बेगानों में उलझता चला गयादर्द कागज़ पर बिखरता चला गया कुछ अपने भी ऐसे थे जो बेगाने हो गए थेसामने फूल और पीछे खंजर लिए खड़े थेमै उनमें खुद को ढूंढता चला गयादर्द कागज़ पर बिखरता चला गया बहुत

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विधवा पर कविता

समाज और यथार्थ

विधवा पर कविता सफेद साड़ी में लिपटी विधवाआँसुओं के चादर में सिमटी विधवामनहूस कैसे हो सकती है भला अपने बच्चों को वह विधवारोज सबेरे जगाती हैउज्जवल भविष्य कीf करे कामनाप्रतिपल मेहनत करती हैसर्वप्रथम मुख देखे बच्चेसफलता की सीढ़ी चढ़ते हैंसमझ नहीं आता फिर भीमनहूस उसे क्यूँ कहते हैं बेटी के लिए ढूँढें वर वहशादी का

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हमसफर पर कविता

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हमसफर पर कविता सात फेरों से बंधे रिश्ते ही*हम सफर*नहीं होतेकई बार *हम* होते हुए भी*सफर* तय नहीं होते कई बार दूर रहकर भीदिल से दिल की डोर जुड़ जाती हैहर पल अपने पन काअहसास दे जाती हैकोई रूह के करीबरहकर भी दूर होता हैकोई दूर रहकर भीधड़कनों में धड़कता हैएक संरक्षण एक अहसासहोता है

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कुंडलियाँ – बेटी पर कविता

नारी जीवन और संवेदना

  बेटी पर कविता बेटी जा पिया के घर ,            गुड़िया नहीं रोना । सजा उस घरोंदे को,            साफ सुथरा रखना।। साफ सुथरा रखना,         पति सेवा तुम करना। रखना इतनी चाह,        झगड़ा कभी न करना ।। कह डिजेन्द्र करजोरि,

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मिलकर पुकारें आओ -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

मिलकर पुकारें आओ ! फिर मिलकर पुकारें आओगांधी, टालस्टाय और नेल्सन मंडेलाया भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और सुभाष चन्द्र बोस कीदिवंगत आत्माओं कोताकि हमारी चीखें सुन उनकी आत्माएंहमारे बेज़ान जिस्म में समाकर जान फूंक देताकि गूंजे फिर कोई आवाजें जिस्म की इस खण्डहर मेंताकि लाश बन चुकी जिस्म में लौटे फिर कोई धड़कनताकि जिस्म में

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बेटी का दर्द पर कविता

विरह और दर्द

बेटी का दर्द पर कविता अब तो लगने लगा है मुझको,कोख में ही माँ मुझको कुचलो।बाहर का संसार है सुंदर,ऐसा लगता है कोख के अंदर।पर जब पढ़ती हो तुम खबरें,हत्या, बलात्कार, जेल और झगड़े।नन्हा सा ये तन मेरा,भर उठता है पीड़ा से।विदीर्ण हो उठता कलेजा मेरा,अंतर में होती है पीड़ा। सुनकर माँ मुझको तकलीफ,जब होती

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हम तो उनके बयानों में रहे -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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हम तो उनके बयानों में रहे हम जब तक रहे बंद मकानों में रहे।वे कहते हैं हम उनके ज़बानों में रहे।1। उनके लिए बस बाज़ार है ये दुनियाँगिनती हमारी उनके सामानों में रहे।2। मुफ़लिसी हमारी तो गई नहीं मगरहमारी अमीरी उनके तरानों में रहे।3। जो बड़े जाने-पहचाने लगते हैं अबकभी हम भी उनके बेगानों में

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