समय का चक्र डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’ की कविता
समय और जीवन दर्शन, हिंदी कवितासमय का चक्र चिता की लकड़ियाँ,ठहाके लगा रही थीं,शक्तिशाली मानव को निःशब्द जला रही थीं! रोकती रही मैं मगर सताता रहाताकत पर अपनी इतराता रहा! भूल जाता बचपन में तुझे खिलौना बन रिझाती रही,थक जाता जब रो-रो करपलना बनकर झुलाती रही! बुढ़ापे में असमर्थ हुआ तोलाठी बनकर चलाती रही,जीवन के संसाधनों में तेरेहरदम काम आती […]
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