हिंदी कविता

समय का चक्र डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’ की कविता

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

समय का चक्र चिता की लकड़ियाँ,ठहाके लगा रही थीं,शक्तिशाली मानव को निःशब्द जला रही थीं! रोकती रही मैं मगर सताता रहाताकत पर अपनी इतराता रहा! भूल जाता बचपन में तुझे खिलौना बन रिझाती रही,थक जाता जब रो-रो करपलना बनकर झुलाती रही! बुढ़ापे में असमर्थ हुआ तोलाठी बनकर चलाती रही,जीवन के संसाधनों में तेरेहरदम काम आती […]

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बेटियां सिर्फ होती पराई हैं…?- संतोष नेमा “संतोष”

समाज और यथार्थ

बेटियां सिर्फ होती पराई हैं दिल्लीहैदराबादऔऱउन्नाव..!!कहाँ हैबेटियों कासुरक्षितठाँव..??शहरदर शहरदरिंदगीबदस्तूरजारी है.!!घटनाओं कीखिलतीरोज नईएक पारी है..!!नेता अबनित नएबयानफेंकते हैं..!ऐसे मौकों पर भीराजनीतिकरोटियांसेंकते हैं..!!क्या यहीपरिदृश्यहै आज का..?हिंदुस्तानीसभ्य समाज का..!!कहाँ गएकानून केलंबे हाथ..?हम क्योंहो गएइतने अनाथ..??क्या हो गएहम इतनेकमजोर..?अपराधियों परनहीं चलताअब कोई जोर..??कब तलकबेटियाँ यूँजलाईजाएंगी..?शैतानों केहाथों यूँसताईजाएंगी..!!तथाकथितबुद्धिजीवीमौन हैं..!!ऐसीघटनाओं परभी रखतेकुछ अलगदृष्टिकोण हैं. !!!“संतोष”क्या हमारीमानसिकतायह बनआई है..!क्या बेटियाँहोतींसिर्फपराई हैं…???—————– @संतोष

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न्याय प्रक्रिया में सुधार जरूरी है-संतोष नेमा “संतोष”

नारी जीवन और संवेदना

न्याय प्रक्रिया में सुधार हैदराबादकांड पर जोमानवाधिकारवाले उन्हेंकल तकअनाचारियों कोदानव कहते थे..!और बड़े हीबेफिक्री सेरहते थे.!!आज उनकाअंजाम देखउनकीमानवताजागी..!बोले बिनन्यायालय मेंअपराध सिद्ध हुएवो कहाँ हैं दागी..?यह सुन एकमहिलाबौखलाई..!बोली येदोगली नीतिकहाँ से आई..?हम भीन्यायालय केनिर्णय कोमानते हैं.!पर न्यायकब मिलेगाये भी जानते हैं..!!निर्भया कीसज़ा अभीबाकी है..!पिछलेआठ वर्षों कीयह झांकी है..!!इस पीड़ा कोआप क्यासमझेंगे.!!आप सिर्फसबूतों कोही परखेंगे..!!“संतोष”न्याय मेंअनावश्यक देरी

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दर्द के रूप कविता

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द के रूप कविता स्वयं के दर्द से रोना,अधिकतर शोक होता है।परायी-पीर परआँसू,बहे तो श्लोक होता है। निकलती आदि कवि की आह से प्रत्यक्ष भासित है,हृदय करुणार्द्र हो,तब अश्रु पर आलोक होता है। धरा की,धेनुओं की,साधुओं की प्रीति-पीड़ा से,हैं धरते देह ईश्वर,पाप-मुञ्चित लोक होता है।   —– R.R.Sahu

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तेरे लिए पर कविता- R R SAHU

हिंदी कविता

तेरे लिए पर कविता दिन की उजली बातों के संग,मधुर सलोनी शाम लिखूँ।रातें तेरी लगें चमकने,तारों का पैगाम लिखूँ।। पढ़ने की कोशिश ही समझो,जो कुछ लिखता जाता हूँ।गहरे जीवन के अक्षर की थाह कहाँ मैं पाता हूँ।। है विराट अस्तित्व मगर मेरी छोटी मर्यादा है।इसको ही सुंदर कर पाना समझो नेक इरादा है।। मेरी बातों

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जिंदगी पर कविता -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

जिंदगी पर कविता आज सुबह-सुबहमित्र से बात हुईउसने हमारेभलीभांति एक परिचित कीआत्महत्या की बात बताईमन खिन्न हो गया जिंदगी के प्रतिक्षणिक बेरुखी-सी छा गईसुपरिचित दिवंगत का चेहराउसके शरीर की आकृतिहाव-भावमन की आँखों में तैरने लगा किसी को जिंदगी कम लगती हैकिसी को जिंदगी भारी लगती हैजिंदगी बुरी और मौत प्यारी लगती है जिंदगी जीने के

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बेटी की व्यथा पर कविता -दूजराम -साहू

नारी जीवन और संवेदना

बेटी की व्यथा पर कविता करूण रस – अब न जन्मूँ “वसुंधरा” में, कर जोर विनती कह रही !सूर – कबीरा के “धरा” में,देखो “बेटी” जुल्म सह रही !! यहाँ – वहाँ, जाऊँ – कहाँ, पग – पग में बैठा दानव है !किसको मैं असुर कहूँ” मां”, किसको मानूंगी मानव है !!इंसानियत अब नजर न

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बेटियों के नसीब में कविता- डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’

हिंदी कविता

बेटियों के नसीब में कविता बेटियों के नसीब में, जलना ही है क्याकाँटे बिछे पथ पर चलना ही है क्या विषम परिस्थितियों में ढलना ही है क्यासबके लिए खुद को बदलना ही है क्या धोखा छल-प्रपंच में छलना ही है क्यापत्थर दिल के वास्ते पिघलना ही है क्या अधूरी मर्जियाँ हाथ मलना ही है क्याहर

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कहां पर खो गया हिंदुस्तान?- शिवराज सिंह चौहान

हिंदी कविता

कहां पर खो गया हिंदुस्तान? खुदा खौफ खाए बैठे,भयभीत भये भगवान।ये कैसा हो गया हिंदुस्तान,कहां पे खो गया हिंदुस्तान।। कोख में बैठी बेटी भी,ये सोच सोच घबराए।जन्म से लेकर मरण तलक,सब नोच नोच कर खाएं।।चिंताओं से घिरी हुई,वो ढूंढ रही मुस्कान…..ये कैसा…..? लोलुप लंपट लवर लफंगे,वहसी व्याभिचारी।खुल्ले आम घूमते फिरते,जुल्मी अत्याचारी।।गली गली हर चौराहे पर,खड़े

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कुण्डलिया की कुण्डलियाँ- कन्हैया साहू ‘अमित’

हिंदी कविता

कुण्डलिया की कुण्डलियाँ। ********************************कुंडलिया लिख लें सभी, रख कुछ बातें ध्यान।**दोहा रोला जोड़ दें, इसका यही विधान।**इसका यही विधान,आदि ही अंतिम आये।**उत्तम रखें तुकांत, हृदय को अति हरषाये।**कहे ‘अमित’ कविराज, प्रथम दृष्टा यह हुलिया।**शब्द चयन है सार, शिल्प अनुपम कुंडलिया।* *रोला दोहा मिल बनें, कुण्डलिया आनंद।**रखिये मात्राभार सम, ग्यारह तेरह बंद।**ग्यारह तेरह बंद, अंत में

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बलात्कार पर कविता

नारी जीवन और संवेदना

बलात्कार पर कविता हो रहे इन बलात्कारों का सबसे बड़ा जिम्मेदार।फिल्म, सीरियल मीडिया और विज्ञापन बाजार। अर्धनग्न तस्वीरों को मीडिया और इंटरनेट परोसता है।बालमन छुप-छुपकर इसमें ही अपना सुख खोजता है। फिल्मी गानें और नाच बच्चों को उकसाते हैं।विज्ञापन में नारी देह ही बार-बार दिखाते हैं। कमतर कपड़ों में दिखाते अश्लील आईटम डाँस।नैतिकता को छोड़

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अपराधी इंसान पर कविता- R R Sahu

हिंदी कविता

अपराधी इंसान पर कविता सभी चाहते प्यार हैं,राह मगर हैं भिन्न।एक झपटकर,दूसरा तप करके अविछिन्न।। आशय चाल-चरित्र का,हमने माना रूढ़।इसीलिए हम हो गए,किं कर्तव्य विमूढ़।। स्वाभाविक गुण-दोष से,बना हुआ इंसान।वही आग दीपक कहीं,फूँके कहीं मकान।। जन्मजात होता नहीं,अपराधी इंसान।हालातों से देवता या बनता हैवान।। भय से ही संभव नहीं,हम कर सकें सुधार।होता है धिक्कार से,अधिक

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