बोल रहे पाषाण
हिंदी कविताबोल रहे पाषाण बोल रहे पाषाण अबव्यक्ति खड़ा मौन है,छोड़ा खुद को तराशनापत्थरों पर ही जोर है।कभी घर की दीवारेंकभी आँगन-गलियारे,रखना खुद को सजाकररंग -रौगन का दौर है।घर के महंगे शो पीसबुलाते चारों ओर हैं ,मनुज को समय नहींअब चुप्पी का दौर है।दिखावे की है दुनियाकलाकारी सब ओर है,असली चेहरा छुपा लेनाअब मुखौटों का दौर

