कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

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सिमटी हुई कली/मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता,

सिमटी हुई कली/मनीभाई नवरत्न सिमटी हुई कली ,मेरे आंगन में खिली।शाम मेरी ढली,तब वह मोती सी मिली।रोशनी छुपाए जुगनू सासारी सारी रात मेरे घर में जली । चंचलता ऐसी जैसे कोई पंछीओढ़े हुए आसमां की चिर मखमली।खुशबू फैल जाए जहां वह मुस्कुराएकदम पड़े उसकी गली गली। सिमटी हुई कली , मेरे आंगन में खिली।

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संस्कार नही मिलता दुकानों में-परमानंद निषाद “प्रिय”

समाज और यथार्थ

संस्कार नही मिलता दुकानों में – परमानंद निषाद “प्रिय” माता-पिता से मिले उपहार।हिंद देश का है यह संस्कार।बुजुर्गो का दर्द समझते नहींनहीं जानते संस्कृति- संस्कार। संस्कार दिये नहीं जाते है।समाज के भ्रष्टाचारों से।संस्कार हमको मिलता है।माता-पिता,घर-परिवार से। बुजुर्गो का सम्मान धर्म हमारा।उनकी सेवा करना कर्म हमारा।संस्कार नही मिलता दुकानों मेंयह मिलता अच्छे संस्कारों में। बुजुर्गो

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अंकुर-रामनाथ साहू ” ननकी “

प्रकृति और पर्यावरण

अंकुर अंकुर आया बीज में , लेता नव आकार ।एक वृक्ष की पूर्णता , देखे सब संसार ।।देखे सब संसार , समाहित ऊर्जा भारी ।अर्ध खुले हैं नैन , प्रकृति अनुकूलन सारी ।।कह ननकी कवि तुच्छ , प्रगट होने को आतुर ।नई सृष्टि आभास , बीज को देता अंकुर । अंकुर होते हैं खुशी ,

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बिछोह पर कविता- मनीभाई

हिंदी कविता

बिछोह पर कविता – मनीभाई” रात भर मैंसावन की झड़ी मेंसुनता रहाटपटप की आवाजपानी की बूंदें।बस खयाल रहाअंतिम विदापिया के बिछोह मेंगिरते अश्रुगीले नैनों को मूंदेपवन झोकेंसरसराहट सीलगती मुझेजैसे हो सिसकियां।झरोखे तलेसारी घड़ियां चलें।जल फुहारेंकंपकपी बिखेरेभय दिखातीअशुभ की कामनामैं व मेरी कल्पना ।। ✍मनीभाई”नवरत्न”७/८/२०१८ मंगल

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कोरोना कइसे भागही – महदीप जंघेल

हिंदी कविता

कोरोना कइसे भागही – महदीप जंघेल दारू भट्ठी में भीड़ ल देखके,मोला लगथे अकबकासी।कोरोना बेरा मा अइसन हालत ले,लगथे अब्बड़ कलबलासी। बिहनिया ले कतार म ठाढ़ होके,घाम पियास म अइंठत हे,सियनहीन गाय सरी ठाढ़े-ठाढ़े ,हफरत लाहकत हे। धरे पइसा,लपेटे मुहूँ मा गमछा,अगोरा मा खड़े हवय।कोरोना ल भुलागे,एक ठन काबर,दू ठन बर धरे हवय। नशाखोरी के

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एक अकेले मदन मोहन

समाज और यथार्थ,

एक अकेले मदन मोहन कुछ  लोग होते हैं, जो महान होते हैं, महात्मा कहलाते हैं, कुछ लोग होते हैं, जो पवित्र होते हैं, शुद्धात्मा कहलाते हैं  कुछ लोग होते हैं देवतुल्य, जो देवात्मा कहलाते हैं  पर महामना हैं केवल एक, जहां अनेक में एक पुण्यात्मा हम पाते हैं  न पहले ना बाद में किसी का,

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वन्दे मातरम् – बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

हिंदी कविता

यह गीत बंकिम चंद्र जी के उपन्यास आनंदमठ (1882) का हिस्सा है। उपन्यास में इसे सन्यासी क्रान्तिकारी गाते हैं। इस गीत में संस्कृत और बांग्ला भाषाओं का मिश्र-प्रयोग हुआ है। इसके पहले दो पैराग्राफ़ को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

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ऊर्जा संरक्षण पर कविता-महदीप जंघेल

हिंदी कविता,

ऊर्जा संरक्षण पर कविता – महदीप जंघेल आओ मिलकर ऊर्जा दिवस मनाएँ।ऊर्जा की बचत का महत्व समझाएँ।। टीवी,पंखा,कूलर,बल्ब में ऊर्जा बचाएँ।आवश्यकता हो तभी, इसे उपयोग में लाएँ।। कच्चे तेल,कोयला,गैस की ,मांग निरन्तर बढ़ रही है।अंधाधुंध उपभोग से ,प्राकृतिक संसाधन घट रही है। ऊर्जा उपयोग कम करने का,लाभ जन-जन को बतलाएँ।भविष्य में उपयोग कैसे हो,महत्व इसका

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शिव स्तुति – केंवरा यदु मीरा

हिंदी कविता

प्रस्तुत कविता शिव स्तुति भगवान शिव पर आधारित है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है।

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पेड़ धरा की शान है परमेश्वर साहू अंचल

हिंदी कविता

पेड़ धरा की शान है परमेश्वर साहू अंचल पेड़ धरा की शान है, नेक सफ़ल अभियान।आओ रोपें मिलकर, तजें तुच्छ अभिमान।। हवा शुद्ध करता यही, खास नेक पहचान।जड़ी बूटी है काम की, पूर्ण करें अरमान।। ताप उमस हरदम हरे, रक्षा करता धूप।शीतल छाया में सदा, निखरे हड़पल रूप।। डंठल पत्तल काम की, आते सारे काम।इससे

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कर्ज पर कविता – मनोरमा चन्द्रा

हिंदी कविता

कर्ज पर कविता – मनोरमा चन्द्रा कर्ज तले जो दब गए, होते हैं गमगीन।उसकी निंदा छोड़ तू, समझ उसे मत दीन।। कर्ज लिया जो आज है, उसे नहीं तू भूल।जो तुमने धोखा दिया, लूँगा कर्ज वसूल।। सेठ कर्ज जितना दिया , सूद संग की चाह।हो वसूल सब राशियाँ , पूरे होते माह।। कर्ज दिया जिसने

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सतत् क्रिया है खोज- मनोरमा चन्द्रा

हिंदी कविता

सतत् क्रिया है खोज- मनोरमा चन्द्रा सबकी अपनी दृष्टि है, एक अलग ही खोज।जो मन को अच्छा लगे, वही करत जन रोज।। जीव खोजता ईश को, लेकिन है अंजान।ईश्वर हृदय विराजते, सार बात यह मान।। चले निरंतर खोज जब, आते हैं परिणाम।त्याग लगन प्रिय साधना, होता जग में नाम।। मेरी आँखें खोजती, नटवर नागर श्याम।कृपा

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