जो कहा नही गया / अज्ञेय
हिंदी कविताजो कहा नही गया / अज्ञेय है,अभी कुछ जो कहा नहीं गया । उठी एक किरण, धायी, क्षितिज को नाप गई,सुख की स्मिति कसक भरी,निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई,बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई।अधूरी हो पर सहज थी अनुभूति :मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई-फिर मुझ बेसबरे से रहा
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