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कोटि-कोटि कंठों ने गाया

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कोटि-कोटि कंठों ने गाया


कोटि-कोटि कंठों ने गाया, माँ का गौरव गान है,
एक रहे हैं एक रहेंगे, भारत की संतान हैं।


पंथ विविध चिंतन नाना विधि बहुविधि कला प्रदेश की,
अलग वेष भाषा विशेष है, सुन्दरता इस देश की।
इनको बाँट-बाँटकर देखें, दुश्मन या नादान हैं। कोटि-कोटि


समझायेंगे नादानों को, सोया देश जगायेंगे।
दुश्मन के नापाक इरादे, जड़ से काट मिटायेंगे।
भारत भाग्यविधाता हम हैं,जन-जन की आवाज है। कोटि-कोटि


ऊँच-नीच निज के विभेद ने, दुर्बल किया स्वदेश को,
बाहर से भीतर से घेरा, अँधियारे ने देश को।
मिटे भेद मिट जाए अँधेरा, जलती हुई मशाल है। कोटि-कोटि


बदलेंगे ऐसी दिशा को, जो परवश मानस करती,
स्वावलंबिता स्वाभिमान से, जाग उठे अम्बर धरती।
पुनरपि वैभव के शिखरों पर बढ़ता देश महान है। कोटि-कोटि,

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