KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

प्यासा पंछी

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~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
*प्यासा पंछी, उड़ता मन*
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यह,मन प्यासा,पंछी मेरा
नील गगन उड़ करे बसेरा ।
पल मे देश विदेशों विचरण,
कभी रुष्ट,पल मे अभिनंदन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

पल में अवध,परिक्रम करता,
सरयू जल अंजुलि में भरता।
पल में चित्र कूट जा पहुँचे,
अनुसुइया के आश्रम पावन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

पल में शबरी आश्रम जाए,
बेर,गुठलियाँ ढूँ ढे खाए।
किष्किन्धा हनुमत से मिलकर,
कपि संगत वह करे जतन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

पल में सागर तट पर जाकर,
रामेश्वर के दर्शन पा कर।
पल मे लंक,अशोक वाटिका,
मिलन विभीषण,पहुँच सदन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

पल मे हनुमत के संग जाता,
संजीवन बूटी ले आता।
मन पल मे हीें रक्ष संहारे,
पुष्पक बैठ अवध आगमन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

राजतिलक और रामराज्य के,
सपने देखे कभी सुराज्य के।
मन पागल या निशा बावरी,
भटके मन ,घर सोया तन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

मै सोचू सपनों की बातें,
मन की सुन्दर,काली रातें।
सपने में तन सोया लेकिन,
रामायण पढ़ करे मनन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*

मेरे मत मन, तन से अच्छा,
प्रेम-प्रीत की रीत में सच्चा।
प्रेमी,बैरी, कुटिल,पूज्यवर,
सबके मन को करे नमन,
*प्यासा पंछी, उड़ता मन।।*
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✍©
बाबू लाल शर्मा”बौहरा” ‘विज्ञ’
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
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