फागुन में पलाश है, रंगों भरी दवात (fagun me palash hai rango bhari dawat)

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फागुन
फागुन में पलाश है, रंगों भरी दवात ।
रंग गुलाबी हो गया, इन रंगों के साथ ।।
अँखियों से ही पूछ गया, फागुन कई सवाल ।
ख्बावों का संग पा लिया, ये नींदें कंगाल ।।
पलट-पलट मौसम तके, भौचक निरखें धूप ।
रह-रहकर चित्त में हँसे, ये फागुन के रूप ।।
फूलों भरी फुलवारियाँ, रस-रंगी बौछार ।
जो भींगें वही जानता, फागुन का ये फुहार ।।
‘सपना’ है खोई हुई, ये फागुन की पद-चाप ।
रंगों वाली हथकड़ी, हमें लगा गई चुपचाप ।।
…..अनिता मंदिलवार ‘सपना’
अंबिकापुर सरगुजा छ. ग.

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