KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

भ्रमित मानस

भ्रम

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भ्रमित मानस

सुमन संग वंदन करूं,  प्राण अर्पित राम चरणों में
मैं दीन-दु:खी जग-मारा,  आया हूं आज चरणों में ।
मैं मूरख मोह- माया में भरमाया
छोड़ राम आसरा,  जग-माया को अपनाया।
लिप्त हुआ मैं,  हाड-मास की काया में
भ्रमित हुआ मैं,  नव- यौवन की छाया में ।
मैं अज्ञानी काम-कर्म में लिप्त हुआ
ना राम भजन ना स्मरण, काम रस में तृप्त हुआ।
ना किया मैंने तरुणाई में,  राम नाम सुमिरन
आया बुढ़ापा देख दशा,  बेचैन हुआ ये मन ।
समझ ना पाया मैं मूरख,  इस भ्रम जाल को
हुआ दु:खी दर-दर भटका,  जब देखा जंजाल को ।
तब मुझ अज्ञानी को ज्ञान हुआ,  वृद्धावस्था में राम स्मरण हुआ ।
तब दौड़ा भागा भागा आया,  कमलनयन राम चरणों में ।।

कवि- हेमेन्द्र परमार

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