KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

*माँ*

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.         ( लावणी छंद )
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माँ की ममता मान सरोवर,
आँसू सातों सागर हैं।
सागर मंथन से निकली जो
माँ ही अमरित गागर है।
गर्भ पालती शिशु को माता,
जीवन निज खतरा जाने।
जन्मत दूध पिलाती अपना,
माँ का दूध सुधा माने।
माँ का त्यागरूप है पन्ना,
हिरणी भिड़ती शेरों से।
पूत पराया भी अपनाती
रक्षा करती गैरों से।
माँ से छोटा शब्द नहीं है।
शब्दकोष बेमानी है।
माँ से बड़ा शब्द दुनियाँ में,
ढूँढ़े तो नादानी है।
भाव अलौकिक है माता के,
अपना पूत कुमार लगे।
फिर हमको जाने क्यों अपनी,
जननी आज गँवार लगे।
भूल रहें हम माँ की ममता,
त्याग मान अरमान को।
जीवित मुर्दा बना छोड़ क्यों,
भूले मातु भगवान को।
दो रोटी की बीमारी से
वृद्धाश्रम में भेज रहे।
जननी जन्मभूमि के खातिर।
कैसी रीति सहेज रहे।
भूल गये बचपन की बातें,
मातु परिश्रम  याद नहीं।
आ रहा बुढ़ापा अपना भी,
फिर कोई फरियाद नहीं।
वृद्धाश्रम की आशीषों में,
घर की जैसी गंध नहीं।
सामाजिक अनुबंधो मे भी,
माँ जैसी सौगंध नहीं।
माँ तो माँ होती है प्यारी,
रिश्तों का अनुबंध नहीं।
सबसे सच्चा रिश्ता माँ का,
क्यों कहते सम्बंध नहीं।
………..………..
सादर ✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान 9782924479
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