रोटी की तलाश

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रोटी की तलाश
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(मनीभाई रचित)
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मुझे उस रोटी की तलाश  है ,
जिसे अभी-अभी
अमीर के कुत्ते ने खाना छोड़ दिया था।
पर  लगता है डर
यह जानकर
कि कहीं अमीर दुत्कार ना दे ,
कि मैंने छीन लिया निवाला
उसके वफादार के मुख का ।।
अंधेरे गुमनाम गलियों में भटकता
कूड़े कचरे में बांचता अपनी जिंदगी ।
मुझे ख्वाहिश नहीं कि
बांध लूं सपनों की गठरी ।
मेरी भूख ही मेरा अस्तित्व ।
हां !मैं कुपोषित हूं ।
पर मुझे परवाह नहीं।
ना  मैं किसी घर का चिराग।
ना आंखों का तारा ।
ना ही किसी अंधे की लाठी ।
हां ! मैं वही असंस्कारी हूं ।
जिसके मां ने फेंक दिया,
नोंचकर अपने तन से ,
अपने संस्कार की दुहाई देकर ।
और सभ्य समाज में मिल गई
मुझे जिन्दगी भर की तन्हाई देकर ।
सच मानो तो मेरा तन
एक सजीव लाश है ।
एक जिद है उसमें जान भरने की
इसलिए तो
मुझे उस रोटी की तलाश है
जिसे अभी-अभी
अमीर के कुत्ते ने खाना छोड़ दिया था।
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