खुद को हराओ/ मनीभाई नवरत्न
हिंदी कवितादूसरों को हराने से पहलेएक युद्ध भीतर लड़ा जाता है।वहाँ न कोई तालियाँ होती हैं,न कोई गवाह—सिर्फ़ तुमऔर तुम्हारी आदतें।खुद को हरानाअपनी सुविधा को चुनौती देना है,अपने अहंकार सेआँख मिलाना है।यह जीतकिसी मंच पर नहीं चढ़ती,यह चुपचापचरित्र में उतरती है।जो अपने डर से भागता हैवह दूसरों को केवल दबा सकता है,हरा नहीं सकता।जो अपनी भूख
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