मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

खुद को हराओ/ मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

दूसरों को हराने से पहलेएक युद्ध भीतर लड़ा जाता है।वहाँ न कोई तालियाँ होती हैं,न कोई गवाह—सिर्फ़ तुमऔर तुम्हारी आदतें।खुद को हरानाअपनी सुविधा को चुनौती देना है,अपने अहंकार सेआँख मिलाना है।यह जीतकिसी मंच पर नहीं चढ़ती,यह चुपचापचरित्र में उतरती है।जो अपने डर से भागता हैवह दूसरों को केवल दबा सकता है,हरा नहीं सकता।जो अपनी भूख

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दर्द के व्यापारी को देख लो/ मनीभाई नवरत्न

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द के व्यापारी को देख लो जिसे देखकरतुम अपने दर्द से लड़ते हो,जिसे पाकरतुम थोड़ी देर जी लेने की हिम्मत जुटाते हो—उसी दर्द का सौदागरतुम्हारे सामने मुस्कुरा कर खड़ा है। वह पहलेतुम्हारे भीतर एक कमी पैदा करता है,फिर उसी कमी का इलाज बनकर आता है।वह घाव देता हैऔर मरहम की कीमत तय करता है।तुम्हारी बेचैनीउसकी

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पहला प्रेम / मनीभाई नवरत्न

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

पहला प्रेम हमारा पहला प्रेमनहीं होना चाहिए किसी और से ।वह होना चाहिए हमारीअपनी ही सर्वोच्च संभावना से —एक उग्र, अडिग, अविराम प्रेम। प्रेम की गुणवत्तानहीं हो सकती अलगहमारे जीवन की गुणवत्ता से ।यदि औसतपन मेंजीवन भीगा हुआ है,तोकैसे दिव्य होगा प्रेम?पर हम तो चाहते हैंपरीकथाओं जैसा प्रेम—और स्वयं डरे हुए,लालची, छोटे जीवन जीते हैं।

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सच्चा प्रेम / मनीभाई नवरत्न

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

सच्चा प्रेम सच्चा प्रेमसुख नहीं देता।वह परीक्षा लेता है।खींचता है।तोड़ता है।वह शिल्पकार की छेनी है—जो निर्दयता सेअनगढ़ पत्थर पर पड़ती है,जब तकरूप प्रकट न हो जाए। जो तुम्हेंपूर्ण संतोष दे सकता है,वह तुम्हेंवैसा ही रहनेकभी नहीं देगाजैसे तुम हो।विस्तारकेवल विस्तृत कोमिलता है।और विस्तृत होने के लिएतुम्हें छोटा होनाछोड़ना पड़ेगा। तुम वही बनते होजिसे तुम सच

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पत्ता, पेट और पृथ्वी

पत्ता, पेट और पृथ्वी / मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

पत्ता, पेट और पृथ्वी हम खड़े हैं एक ऐसे समय मेंजहाँ सवालरोटी बनाम रोज़गार का नहीं,रोटी बनाम भविष्य का है।तेंदूपत्ता अब केवल पत्ता नहीं रहा—वह नीति है, मजबूरी है,हमारी सामूहिक चुप्पी काहरा दस्तावेज़ है। मनुष्य कहता है—मेरे बच्चे हैं,मेरी भूख है,विकल्प नहीं मेरे पास ।जबकिविकल्प हमेशा होता है,बस हम टालते रहते हैं उसे।जो जलती है

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वही डूबना तैरना है / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

वही डूबना तैरना है जो सच में सार्थक है,उसमें जब तुम डूबते हो,तो फालतू बातेंदरवाज़े पर आकर भीअंदर नहीं आ पातीं। वे दस्तक देती हैं,पर भीतर कोई खाली नहीं मिलता—मन किसी सच्ची उपस्थिति सेभरा हुआ होता है। पर सावधान।हर डूबना मुक्ति नहीं होता। कुछ डूबनाबेहोशी की तरह होता है—जहाँ चिंता इसलिए नहीं मिटतीकि हल मिल

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लक्ष्य / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

ऐसा लक्ष्य चुनो, जहाँ पहुँचा ही न जा सके ऐसा लक्ष्य मत चुनो कि जो पूरा हो जाए।बल्कि ऐसा लक्ष्य चुनोजो हमें आख़िरी साँस तकचलाए रखे।क्योंकि जिस दिनहम कहते हैं कि —मैं पहुँच गया अपने लक्ष्य तक —उसी दिनपतन शुरू हो जाता है। पूर्णता का भ्रमसबसे बड़ा विश्राम है।और विश्रामअहंकार का प्रिय आसन।इसलिए उद्देश्यइतना ऊँचा

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चुनाव / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

चुनाव सारी असहायताऔर दोषारोपणएक अभिनय है।सबसे कमज़ोर क्षण में भीहम इतने सक्षम होते हैंकि चुनाव कर सकें।और यही वह शक्ति हैजो हमें दिल के सबसे पासरखना चाहिए। कोई भी स्थितिइतनी अँधेरी नहीं होती किसही चुनाव से हमेंछूट मिल जाए।और कोई भी स्थितिइतनी उजली नहीं होती किसही चुनावअनावश्यक हो जाए। सुख हो या दुःख,स्पष्टता हो या

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jeb aur jism

“जेब और जिस्म की शादी”

समाज और यथार्थ

“जेब और जिस्म की शादी” शादी—एक ऐसा शब्दजिसके भीतर प्रेम से ज़्यादाभ्रम रहता है।हम सोचते हैंहम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—पर सच मेंहम उसके भीतर नहीं देखते,सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं। लड़की की दृष्टिलड़के की जेब में उतरती है—वह भविष्य नहीं ढूँढती,भविष्य की गारंटी ढूँढती है।जैसे मनुष्य नहीं,एक बीमा पॉलिसी चुन रही होजिस

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भारत छोडो आन्दोलन

सवाल ही पहली क्रांति / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सवाल ही पहली क्रांति हुकूमत करने वालेसिर्फ़ दो-चार,कुर्सी पर बैठे,कलम और बंदूक के सहारेअपने को विशाल समझते हैं।मानने वालेहज़ारों नहीं,लाखों में—फिर भी सिर झुकाए,नज़रें ज़मीन पर टिकी हुई। डर की भाषासबको समझाई जाती है—कभी नौकरी का डर,कभी रोटी का,कभी जेल का,तो कभी बदनामी का।शासन तलवार से नहीं चलता,चलता हैदिलों में भरे गए डर से। दो-चार

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समझ / मनीभाई नवरत्न

मन और भावनाएँ

समझजानकारी नहीं है।जो पढ़ ली जाए,याद कर ली जाए—वह समझ नहीं। समझवह हैजो देखने के बादबदलने को विवश कर दे। जो सच दिखा देऔर फिरपुराना बने रहनाअसंभव कर दे—वही समझ है। समझभावना नहीं है।आँसू आ जाएँ,दिल भर आए—यह संवेदना हो सकती है,समझ नहीं। समझतब होती हैजब आँसू नहीं,भ्रम गिरते हैं। जबदोष देना छूटता है,शिकायत थमती

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सवाल / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सवाल (अतुकांत कविता) सवालवह नहीं जो किताब में छपा हो,सवाल वह हैजो मन में चुभे। सवालवह नहीं जो उत्तर माँगे,सवाल वह हैजो नींद छीन ले। जब बाहर ठीक दिखता हो,और भीतर कुछ ठीक न लगे—वहीं सेसवाल जन्म लेता है। सवालभीड़ से नहीं आता,सवालअकेलेपन मेंखुद से टकराकरउभरता है। जो कहा गया हैउसे मान लेना आसान है,पर“क्यों?”

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