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बाँके बिहारी बरबीगहीया द्वारा रचित छठ पर्व आधारित कविता जिसे पढ़कर आपको आनंद मिलेगा

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शुक्ल पक्ष पष्ठी  तिथि को
कार्तिक मास में आती है ।
सूर्य की प्रिय बहन प्रकृति 
छठी मईया कहलाती है ।
सूर्योपासना का महान पर्व में
छठी माँ दिव्य रूप दिखाती है।
महान व्रत इस छठ पर्व में
करतीं छठवर्ती आदित्य का ध्यान
प्रभु सविता और छठी मईया को
जगत आज करें दंड प्रणाम ।। 
लोक आस्था का यह महापर्व
शुद्ध संस्कृति की है पहचान ।
कठिन तपस्या कर छठवर्ती
पातीं हैं सूर्य से अभय दान ।
केला,सेब,नाशपाती,नारियल
मूली,ईख,घी के  पकवान ।
प्रभु सविता और छठी मईया को
जगत आज करे दंड प्रणाम ।।
कदुआ-भात नहाय खाय दिन
खरना के दिन बनें महाप्रसाद।
माँ के अंश इस महाप्रसाद में
मिलता है हमें  अद्भुत   स्वाद।
अरग के दिन घाटो पर गूँजे
सूर्य छठी माँ की पावन नाद।
जन-जन की रक्षक है मईया
करातीं सबको अमृत रसपान।
प्रभु सविता और छठी मईया को
जगत आज करे दंड प्रणाम ।।
यूपी, बिहार, पूर्वांचल  क्षेत्र से
झारखंड नेपाल की तराई तक ।
गंगा ,यमुना ,सरयु तट  पर 
महासागर की गहराई  तक ।
महान पर्व होता यह छठ का
धरती से लेकर जुन्हाई   तक।
सीता ,द्रोपदी,राजा प्रियव्रत भी
किए थे यह  पर्व महान ।
प्रभु सविता और छठी मईया को
जगत आज करे  दंड  प्रणाम ।।
सृष्टि  की  अधिष्ठात्री  प्रकृति
छठी मईया बन उतपन्न हुईं ।
जन कल्याण करने को माता 
सर्वगुण से माता संपन्न हुई ।
सबकी रक्षक बन आती माता
जो सूर्य की प्रिय बहन हुई  ।
छठव्रत करने से प्राणी  को
हर्ष उल्लास मिलते हैं संतान
प्रभु सविता और छठी मईया को
जगत  आज करे  दंड प्रणाम।।
✒बाँके बिहारी बरबीगहीया ✒
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