KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

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बसन्त- बहार

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बसन्त- बहार

लावणी छंद -16,14 अन्त गुरु


ऊषा अवगुण्ठन के बदरा,हटे आज धीरे- धीरे,
दिनमणि की स्वर्णिम किरणों से, निशि के मिट गये अँधेरे।


सतरंगी आँचल ऊषा का ,लहराया बहका- बहका
मौन तोड़कर मुखर हुई अब, कलियों का सौरभ महका ।


छा गई बसन्त बहार झूम, उठी विटप की हर डाली।
आम्र डाल पिक झूला झूले गाती मृदु स्वर मतवाली।


मन चंचल गति मधुप डोलते लख पुहुप पराग लुभाये ,             
मधुरस ले उड़ चले श्याम मन, कहाँ दूर तक टिक पाये।


सरसों की चादर खेतों में,दूर-दूर तक बिछी हुई।
विविध रंग कुसुमों की शोभा, देख भ्रमर गति तीव्र हुई।

उड़ते खग देखे महि सुषमा, तनिक झाँक कर नीचे से,
पंक्ति बद्ध गति और बढाते, शिशुओं की सुधि आने से।


बहुरंगी तितली पर फैला, नव कुसुमों पर फुदक रही।
नन्हीं सुन्दर पंख देख कर भाग- भाग कर पकड़ रही।


पुष्पा शर्मा “कुसुम”

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