KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

बेटी -बाबूलाल शर्मा (लावणी छंद)

*लावणी छंद*:-16,14 पर यति
दो पंक्तियाँ समतुकांत
(अंत में लघु गुरु बंधन नहीं)

0 51

बेटी -बाबूलाल शर्मा (लावणी छंद)


बेटी है अनमोल धरा पर,
उत्तम अनुपम  सौगातें।
सृष्टि नियंता मात् पुरुष की,
ईश जनम जिससे पाते।

बेटी से घर आँगन खिलता,
परिजन प्रियजन सब हित में।
इनका भी सम्मान करें ये
जीवन बाती परहित में।

बेटी सबकी रहे लाड़ली,
सबको वह दुलराती है।
ईश भजन सी शुद्ध दुआएँ,
माँ बनकर सहलाती हैं।

बेटी तो वरदान ईश का ,
जो दुख सुख को भी साधे।
बहिन बने तो आशीषों से,
रक्ष सूत बंधन बाँधे।

मात पिता घर रोशन करती,
पिय घर जाकर उजियाली।
मकानात को घर कर देती,
घर लक्ष्मी ज्यों दीवाली।

बेटी जिनके घर ना जन्मे,
लगे भूतहा वह तो घर।
जिस घर बेटी चिड़िया चहके,
उस घर में काहे का डर।

मर्यादा बेटी से निभती,
बहु बनती है लाड़ो जब।
रीत प्रीत के किस्से कहती,
नानी दादी बनती तब।

दुर्गा सी रण चण्डी बनती,
मातृभूमि की रक्षा को।
कौन भूलता भारत भू पर,
रानी झाँसी,इन्द्रा को।

करे कल्पना अंतरिक्ष की,
सच में सुता कल्पना थी।
पेड़ के बदले शीश कटाए,
उनके संग अमृता थी।

सिय सावित्री राधा मीरा,
रजिया पद्मा याद करो।
अनुराधा व लता के गीतों,
संगत भी आह्लाद भरो।

शिक्षा और चिकित्सा देखो,
पीछे कब ये रहती हैं।
दिल दूखे तब पूछूँ सबसे,
अनाचार क्यों सहती है।

जग जननी को गर्भ मारते,
हम ही तो सब दोषी हैं।
नारिशक्ति को जो अपमाने,
पूर्वाग्रह संपोषी है।

बेटी का सम्मान करें हम,
नारि शक्ति को सनमाने।
विविध रूप संपोषे इनके,
सुता शक्ति को पहचाने।

इनको बस इनका हक चाहे,
लाड़ प्यार अकसर दे दो।
आसमान छू लेंगी तय है,
बेटे ज्यों अवसर दे दो।

बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.