बहुरूपिया

बहुरूपिया

बकरी बनकर आया,
मेमने को लगाकर सीने से,
प्यार किया,दुलार किया!
दूसरे ही क्षण–
भक्षण कर मेमने का,
तृप्त हो डकारा,
बहुरूपिये भेड़िये ने फिर,
अपना मुखौटा उतारा!!
—-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’
अम्बिकापुर,सरगुजा(छ. ग.)

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